सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात् |

स भूमिं विश्वतोवृत्वात्यतिष्ठद्दशांगुलम् || १ ||

इस मन्त्र का अर्थ है – सर्व अन्तर्यामी परमात्मा इस समस्त ब्रह्माण्ड की भूमि को सब और से व्याप्त करके स्थित है , और इससे दस अंगुल ऊपर भी है | अर्थात ब्रह्माण्ड में व्यापक होते हुए वे इससे परे भी है | उन परमात्मा के मस्तक , नैत्र आदि ज्ञानेन्द्रियाँ हजारों है असंख्य है |

 

इस मन्त्र से मनुष्य के कल्याण का अर्थ है – 

मनुष्य भी ब्रह्मांड की कई भूमि पर व्यापत है | मनुष्य के अंदर विद्यमान आत्मा परमात्मा का एक अंश मात्र है | जिसे वह बाहरी दुनिया में देखने का प्रयास करता है | आत्मा कई बार इस धरती पर आती है जिसका स्वरूप नही है | मनुष्य मरने के बाद आत्मा रूप में एवं परमात्मा में ही समावेश  हो जाता है | और फिर जन्म लेता है | परन्तु माँ के गर्भ में परमात्मा रूप  में आता है | एवं 9 महीने बाद शरीर प्राप्त कर पराभाव हो जाती है | व परमात्मा को नही जानती व आत्मा को भी खुद ईश्वरीय भ्रम में राम जाती है |

Leave a Reply

Your email address will not be published.

error: Content is protected !!
%d bloggers like this: