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January 27, 2023 23:19
Omasttro

 

 
     कुछ दिन पश्चात सुमाली राक्षस रसातल से निकलकर अपनी सुंदरी कन्या सहित मनुष्यलोक में विचरने लगा | तब इस प्रकार पृथ्वी पर विचरते हुए उसने पुष्पक विमान पर आरूढ़ कुबेरजी को देखा, जो अपने पिता विश्रवा के दर्शन करने जा रहे थे | यह देख सुमाली को आश्चर्य हुआ | वह मृत्युलोक छोड़ रसातल में पहुँच अपनी पुत्री कैकसी से बोला-हें पुत्रि! अब तुम्हारे विवाह का समय हो चुका हैं |
 
     अधिक क्या कहें, मानीजनों के लिए कन्या दु:ख का कारण होती हैं | क्योंकि यह कोई पहले से नहीं जनता कि, कन्या का विवाह कैसे वर से होगा | मातृकुल, पितृकुल और श्वसुरकुल-इन तनों कुलों को कन्या सदैव संशययुक्त रखती हैं | अत: अब तुम ब्रह्मा के कुल में उत्पन्न पुलस्त्य के पुत्र विश्रवा मुनि को स्वयं जाकर वरण कर लो | हें पुत्री! विश्रवा को वरण करने से तुझे कुबेर के समान ही तेजस्वी पुत्र लाभ होगा |
 
     फिर तो वह कन्या अपने पिता के वचनों को सुन और पितृ-गौरव को स्वीकार कर जहां विश्रवा मुनि तपस्या कर रहे थे, वहां जाकर कड़ी हो गई | तब पूर्ण चंद्रानना उस परम सुंदरी को देख परमोदर विश्रवा मुनि ने उस कन्या से कहा-‘भद्रे! तू किसकी दुहिता हैं और यहां कैसे आई हैं ? तब उस कन्या ने हाथ जोड़कर कहा-महाराज! यहतो आप अपने तप से ही जान सकते हैं ? फिर भी मैं आपको यह बतलाती हूँ कि, मै अपने पिता की आज्ञा से आपके पास आई हूँ और मेरा नाम कैकसी हैं |
 
     शेष वृत्तान्त आप स्वयं ही जान सकते हैं | विश्रवा मुनि ने ध्यान कर उसके आने का प्रयोजन ज्ञात कर लिया और तब उससे कहा-हें भद्रे! मैंने तेरे मन की बात जान ली | हें मत्तगजेंद्रगामिनी! मुझसे पुत्र उत्पन्न करने की तेरी अभिलाषा हैं, किन्तु इस दारुण समय में तू मेरे पास आई हैं |
 
     अत: तुमसे क्रूर कर्मा राक्षस उत्पन्न होंगे | विश्रवा मुनि के ऐसे वचन सुन कैकसी ने कहा-हें भगवन! आप जैसे ब्रह्मवादी द्वारा मैं दुराचारी पुत्रों को नहीं चाहती | अत: आप मुझ पर कृपा कीजिए | इस पर मुनिश्रेष्ठ ने कहा-अच्छा, तेग पिछला पुत्र मेरे वंशानुरूप धर्मात्मा होगा-इसमें कोई संदेह नहीं हैं |
 
     हें राम! फिर तो कुछ काल पश्चात उसने बड़ा भयंकर वीभत्सरुपी राक्षस पुत्र प्रसव किया | उसके दस सिर, बड़े-बड़े दांत और बीस भुजाएं थी तथा वह काले रंग का पहाड के समान था | उसके लाल होठ, विशाल शिर और चमकीले बाल थे | उसके जन्मते ही पृथ्वी कांपने लगी, समुद्र खलबला उठा,, आकाश से बड़े-बड़े उल्कापात हुए |
 
     सूर्य का प्रकाश गंद पड़ गया और देवताओं ने रक्त की वर्षा की | तदनंतर पितामह ब्रह्मा के समान ही उसके पिता ने उसका नामकरण किया और कहा कि इस दस शिर वाले पुत्र का नाम दसग्रीव होगा | फिर कैकसी के गर्भ से कुम्भकर्ण का जन्म हुआ जिसके समान लंबा-चौड़ा कोई अन्य प्राणी नहीं था |
 
     फिर विकराल मुख वाली सूर्पणखा उत्पन्न हुई और सबके पश्चात धर्मात्मा विभीषण का जन्म हुआ | उसके जन्म के समय आकाश से पुष्प-वृष्टि हुई तथा देवताओं ने दुन्दुभि बजायी और सबने साधु-साधु कहा | कुम्भकर्ण और दशग्रीव महावन में बढ़ने लगे | कुम्भकर्ण बड़ा उन्मत्त हुआ |
 
     उसको भोजन से कभी तृप्ति ही न होती थी और तीनों लोकों में घूमकर महर्षियों का भक्षण किया करता था | विभीषण बाल्यकाल से ही धर्मात्मा था | वह सर्वदा धर्म में स्थित रह स्वाध्याय करता और नियमित आहार करते हुए इन्द्रियों को अपने वश में रखता |
 
     कुछ काल पश्चात धनपति वैश्रवण पुष्पक विमान पर बैठ अपने पिता का दर्शन करने के लिए वहां आए, जो अपने तेज से प्रदीप्त हो रहे थे | तब उन्हें देखकर राक्षस-कन्या कैकसी अपने पुत्र दशग्रीव के पास आई और बोली-हें पुत्र! अपने भाई वैश्रवण को देखा, ये कैसे तेजस्वी हैं |
 
     क्या ही अच्छा होता यदि तुम भी अपने भाई के समान हो | यद्यपि तुम बड़े पराक्रमी हो, तथापि ऐसा प्रयत्न करो, जिससे तुम भी वैश्रवण के ही समान तेजस्वी और वैभवशाली हो जाओ |’ माता की यह बात सुनकर प्रतापी दशग्रीव को बड़ा रोष हुआ |
 
     उसने कहा-माँ! तुम चिंता न करो | मैं प्रतिज्ञापूर्वक कहता हूँ कि, अपने पराक्रम से भाई वैश्रवण के समान या उससे भी बढ़कर हो जाऊँगा | यह कहकर उसने तपस्या करने का विचार किया और गोकर्ण के पवित्र आश्रम पर जाकर वहां भाइयों सहित तप करने लगा | उसने घोर तपकर ब्रह्माजी को प्रसन्न कर लिया | उन्होंने प्रसन्न होकर उसे विजयदायक वर प्रदान किया |
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