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January 28, 2023 16:07
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विश्रवा की उत्पत्ति प्रसङ्ग वर्णन 

 
महात्मा राघव के इस वचन को सुनकर महातेजस्वी अगस्त्यजी ने कहा-हें राम! सुनिये, इन्द्रजीत महत तेजस्वी और बलवान था जिससे उसका कोई शत्रु उसे मार नहीं सकता था, वह अपने शत्रु का वध करके ही रहता था | हें राघव! इस सम्बन्ध में मैं तुम्हे पहले रावण का जन्म और उसकी वर-प्राप्ति का वर्णन करता हूँ | 
 
     पूर्व सतयुग में ब्रह्मा के एक पुत्र पुलस्त्य नामक थे | जिनके तप का प्रभाव ब्रह्माजी के ही समान था | तब एक तो उनका ऐसा तप दुसरे विमल गुणवान भी थे | इससे ये सभी के मित्र बन गए | तप करने की इच्छा से वे मुनिश्रेष्ठ मेरुपर्वत के समीप तृणबिंदु के आश्रम में जाकर तप करने लगे | तब उनको तप: स्वाध्याय में रत देख, वेदमन्त्र श्रवण और विहार की इच्छा से बहुत-सी  कन्याएँ वहा जाने लगी | 
 
     उनमे अप्सराएँ भी रहती और ये सब ऋषियों, नागों और राजर्षियो की कन्याए थी | इनके कारण तपस्वी पुलस्त्य के तप में विघ्न पड़ने लगा | इससे एक दिन पुलस्त्य जी ने कह दिया कि अब कल से जो कन्या यहाँ मुझे दिखाई पड़ेगी वह गर्भवती हो जाएगी | इस ब्रह्मशाप के भय से दुसरे दिन कन्याएँ वहाँ नहीं गयी | परन्तु उनमे राजर्षि तृणबिन्दु की कन्या ने नहीं सुना था, इसलिए वह दुसरे दिन पुलस्त्यजी के आश्रम में चली गई और स्वच्छन्दता से विचरने लगी | 
 
     परन्तु उसने अन्य कन्याओ को वहा नहीं देखा | इससे उसे कुछ आश्चर्य हुआ | फिर भी वह राजर्षिकन्या वेद ध्वनि सुनने की इच्छा से मुनि का दर्शन करने चली गयी | किन्तु जैसे ही उन तेजस्वी मुनि को देखा, वैसे ही उसका शरीर पीला पड़ गया और वह गर्भवती हो गई | उसे अपना शरीर देखकर बड़ी व्यग्रता हुई और वह भाग अपने पिता के आश्रम में चली आयी | यहाँ पिता ने देखते ही उससे जो समाचार पूछा तो उसने कहा-और तो कुछ नहीं | 
 
     आज पुलस्त्य मुनि के आश्रम में जाते ही मेरे अंगों में यह परिवर्तन अनायास हो आया हैं | मुनि ने नेत्र बन्द कर देखा तो उन्हें सब कुछ ज्ञात हो गया | वे उस कन्या को साथ ले पुलस्त्य मुनि के आश्रम पर आये और उनसे प्रार्थनापूर्वक उसे अपनी सेवकिनी बना लेने की प्रार्थना की | ब्राह्मण श्रेष्ठ पुलस्त्य जी धार्मिक राजर्षि तृणबिन्दु के उन वचनों को सुन उस कन्या को ‘बहुत अच्छा’ ऐसा कहकर अंगीकार किया | 
 
     कन्या को पुलस्त्य जी को सौंप राजा तृणबिन्दु अपने आश्रम में लौट आये | वह राजतनया भी अपने गुणों से पति को संतुष्ट कर वहाँ रहने लगी | तब एक दिन उसके शील-स्वभाव से संतुष्ट हो मुनिश्रेष्ठ पुलस्त्यजी उससे बोले कि ‘हें सुश्रोणि! मैं तुम पर बहुत प्रसन्न हूँ, इसलिए हें देवी! आज मैं अपने ही तुल्य एक ऐसा पुत्र देता हूँ कि जो उत्तम वंशो का वर्द्धक होगा और पौलस्त्य नाम से प्रसिद्ध होगा | 
 
     परन्तु तुमने मेरी ध्वनि सुनकर गर्भ धारण किया हैं जिससे उसका नाम विश्रवा होगा | ऐसा वर पाकर वह देवी प्रसन्न हुई | फिर तो कुछ ही समय पश्चात त्रिलोक विख्यात यशोधर्म समन्वित विश्रवा नामक पुत्र को प्रसव किया | यह विश्रवा भी वेदज्ञ मुनि व्रतचारी तथा अपने पिता के समान तपस्वी हुए | 
 
 
 
 
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