Omasttro

2022 में दशहरा

5

अक्टूबर, 2022

(बुधवार)

विजयदशमी मुहूर्त  

विजय मुहूर्त :
14:07:19 से 14:54:28 तक
अवधि :
0 घंटे 47 मिनट
अपराह्न मुहूर्त :
13:20:11 से 15:41:37 तक
 
 
 
 

आइए जानते हैं कि 2022 में दशहरा कब है व दशहरा 2022 की तारीख व मुहूर्त। दशहरा पर्व अश्विन माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को अपराह्न काल में मनाया जाता है। यह पर्व अच्छाई की बुराई पर जीत का प्रतीक है। इसी दिन पुरूषोत्तम भगवान राम ने रावण का वध किया था। कुछ स्थानों पर यह त्यौहार विजयादशमी,के रूप में जाना जाता है। पौराणिक मान्यतानुसार यह उत्सव माता विजया के जीवन से जुड़ा हुआ है। इसके अलावा कुछ लोग इस त्योहार को आयुध पूजा(शस्त्र पूजा) के रूप में मनाते हैं।

दशहरा मुहूर्त

1.  दशहरा पर्व अश्विन माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को अपराह्न काल में मनाया जाता है। इस काल की अवधि सूर्योदय के बाद दसवें मुहूर्त से लेकर बारहवें मुहूर्त तक की होती।
2.  यदि दशमी दो दिन हो और केवल दूसरे ही दिन अपराह्नकाल को व्याप्त करे तो विजयादशमी दूसरे दिन मनाई जाएगी।
3.  यदि दशमी दो दिन के अपराह्न काल में हो तो दशहरा त्यौहार पहले दिन मनाया जाएगा।
4.  यदि दशमी दोनों दिन पड़ रही है, परंतु अपराह्न काल में नहीं, उस समय में भी यह पर्व पहले दिन ही मनाया जाएगा।

श्रवण नक्षत्र भी दशहरा के मुहूर्त को प्रभावित करता है जिसके तथ्य नीचे दिए जा रहे हैं:

1.  यदि दशमी तिथि दो दिन पड़ती है (चाहे अपराह्ण काल में हो या ना) लेकिन श्रवण नक्षत्र पहले दिन के अपराह्न काल में पड़े तो विजयदशमी का त्यौहार प्रथम दिन में मनाया जाएगा।
2.  यदि दशमी तिथि दो दिन पड़ती है (चाहे अपराह्न काल में हो या ना) लेकिन श्रवण नक्षत्र दूसरे दिन के अपराह्न काल में पड़े तो विजयादशमी का त्यौहार दूसरे दिन मनाया जाएगा।
3.  यदि दशमी तिथि दोनों दिन पड़े, लेकिन अपराह्ण काल केवल पहले दिन हो तो उस स्थिति में दूसरे दिन दशमी तिथि पहले तीन मुहूर्त तक विद्यमान रहेगी और श्रवण नक्षत्र दूसरे दिन के अपराह्न काल में व्याप्त होगा तो दशहरा पर्व दूसरे दिन मनाया जाएगा।
4.  यदि दशमी तिथि पहले दिन के अपराह्न काल में हो और दूसरे दिन तीन मुहूर्त से कम हो तो उस स्थिति में विजयादशी त्यौहार पहले दिन ही मनाया जाएगा। इसमें फिर श्रवण नक्षत्र की किसी भी परिस्थिति को ख़ारिज कर दिया जाएगा।

दशहरा पूजा एवं महोत्सव

अपराजिता पूजा अपराह्न काल में की जाती है। इस पूजा की विधि नीचे दी जा रही है:

1.  घर से पूर्वोत्तर की दिशा में कोई पवित्र और शुभ स्थान को चिन्हित करें। यह स्थान किसी मंदिर, गार्डन आदि के आस-पास भी हो सकता है। अच्छा होगा यदि घर के सभी सदस्य पूजा में शामिल हों, हालाँकि यह पूजा व्यक्तिगत भी हो सकती है।
2.  उस स्थान को स्वच्छ करें और चंदन के लेप के साथ अष्टदल चक्र (आठ कमल की पंखुडियाँ) बनाएँ।
3.  अब यह संकल्प लें कि देवी अपराजिता की यह पूजा आप अपने या फिर परिवार के ख़ुशहाल जीवन के लिए कर रहे हैं।
4.  उसके बाद अष्टदल चक्र के मध्य में अपराजिताय नमः मंत्र के साथ माँ देवी अपराजिता का आह्वान करें।
5.  अब माँ जया को दायीं ओर क्रियाशक्त्यै नमः मंत्र के साथ आह्वान करे।
6.  बायीं ओर माँ विजया का उमायै नमः मंत्र के साथ आह्वान करें।
7.  इसके उपरांत अपराजिताय नमः, जयायै नमः, और विजयायै नमः मन्त्रों के साथ शोडषोपचार पूजा करें।
8.  अब प्रार्थना करें, हे देवी माँ! मैनें यह पूजा अपनी क्षमता के अनुसार संपूर्ण की है। कृपया जाने से पूर्व मेरी यह पूजा स्वीकार करें।
9.  पूजा संपन्न होने के बाद प्रणाम करें।
10.  हारेण तु विचित्रेण भास्वत्कनकमेखला। अपराजिता भद्ररता करोतु विजयं मम। मंत्र के साथ पूजा का विसर्जन करें।

अपराजिता पूजा को विजयादशमी का महत्वपूर्ण भाग माना जाता है, हालाँकि इस दिन अन्य पूजाओं का भी प्रावधान है जो नीचे दी जा रही हैं:

1.  जब सूर्यास्त होता है और आसमान में कुछ तारे दिखने लगते हैं तो यह अवधि विजय मुहूर्त कहलाती है। इस समय कोई भी पूजा या कार्य करने से अच्छा परिणाम प्राप्त होता है। कहते हैं कि भगवान श्रीराम ने दुष्ट रावण को हराने के लिए युद्ध का प्रारंभ इसी मुहुर्त में किया था। इसी समय शमी नामक पेड़ ने अर्जुन के गाण्डीव नामक धनुष का रूप लिया था।
2.  दशहरे का दिन साल के सबसे पवित्र दिनों में से एक माना जाता है। यह साढ़े तीन मुहूर्त में से एक है (साल का सबसे शुभ मुहूर्त – चैत्र शुक्ल प्रतिपदा, अश्विन शुक्ल दशमी, वैशाख शुक्ल तृतीया, एवं कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा (आधा मुहूर्त))। यह अवधि किसी भी चीज़ की शुरूआत करने के लिए उत्तम है। हालाँकि कुछ निश्चित मुहूर्त किसी विशेष पूजा के लिए भी हो सकते हैं।
3.  क्षत्रिय, योद्धा एवं सैनिक इस दिन अपने शस्त्रों की पूजा करते हैं; यह पूजा आयुध/शस्त्र पूजा के रूप में भी जानी जाती है। वे इस दिन शमी पूजन भी करते हैं। पुरातन काल में राजशाही के लिए क्षत्रियों के लिए यह पूजा मुख्य मानी जाती थी।
4.  ब्राह्मण इस दिन माँ सरस्वती की पूजा करते हैं।
5.  वैश्य अपने बहीखाते की आराधना करते हैं।
6.  कई जगहों पर होने वाली नवरात्रि रामलीला का समापन भी आज के दिन होता है।
7.  रावण, कुंभकर्ण और मेघनाथ का पुतला जलाकर भगवान राम की जीत का जश्न मनाया जाता है।
8.  ऐसा विश्वास है कि माँ भगवती जगदम्बा का अपराजिता स्त्रोत करना बड़ा ही पवित्र माना जाता है।
9.  बंगाल में माँ दुर्गा पूजा का त्यौहार भव्य रूप में मनाया जाता है।

दशहरा की कथा

• पौराणिक मान्यता के अनुसार इस त्यौहार का नाम दशहरा इसलिए पड़ा क्योंकि इस दिन भगवान पुरूषोत्तम राम ने दस सिर वाले आतातायी रावण का वध किया था। तभी से दस सिरों वाले रावण के पुतले को हर साल दशहरा के दिन इस प्रतीक के रूप में जलाया जाता है ताकि हम अपने अंदर के क्रोध, लालच, भ्रम, नशा, ईर्ष्या, स्वार्थ, अन्याय, अमानवीयता एवं अहंकार को नष्ट करें।

• महाभारत की कथा के अनुसार दुर्योधन ने जुए में पांडवों को हरा दिया था। शर्त के अनुसार पांडवों को 12 वर्षों तक निर्वासित रहना पड़ा, जबकि एक साल के लिए उन्हें अज्ञातवास में भी रहना पड़ा। अज्ञातवास के दौरान उन्हें हर किसी से छिपकर रहना था और यदि कोई उन्हें पा लेता तो उन्हें दोबारा 12 वर्षों का निर्वासन का दंश झेलना पड़ता। इस कारण अर्जुन ने उस एक साल के लिए अपनी गांडीव धनुष को शमी नामक वृक्ष पर छुपा दिया था और राजा विराट के लिए एक ब्रिहन्नला का छद्म रूप धारण कर कार्य करने लगे। एक बार जब उस राजा के पुत्र ने अर्जुन से अपनी गाय की रक्षा के लिए मदद मांगी तो अर्जुन ने शमी वृक्ष से अपने धनुष को वापिस निकालकर दुश्मनों को हराया था।

• एक अन्य कथानुसार जब भगवान श्रीराम ने लंका की चढ़ाई के लिए अपनी यात्रा का श्रीगणेश किया तो शमी वृक्ष ने उनके विजयी होने की घोषणा की थी।

• यदि आप इस त्यौहार का असल में स्वाद चखना चाहते हैं तो मैसूर जाएँ। मैसूर दशहरा पर्व बहुत ही बृहद रूप में मनाया जाता है जो कि बहुत प्रसिद्ध है। दशहरा त्यौहार से लोग दिवाली उत्सव के लिए अपनी तैयारियाँ शुरु कर देते हैं।

• इस जानकारी के साथ हम आशा करते हैं कि आप इस दिन को अपने लिए मंगलकारी बनाने में सफल होंगे।

दशहरा पर्व की हार्दिक बधाई!

 

 

 

Dussehra 2022: भगवान श्रीराम ने लंका के राजा रावण से युद्ध लड़ा और उसे पराजित करके असत्य पर सत्य की जीत का संदेश दिया। रावण को महाज्ञानी, महा शक्तिशाली माना जाता है। रावण स्वयं में एक महान व्यक्तित्व था। भले ही प्रभु श्रीराम ने रावण का वध किया हो लेकिन कहा जाता है कि खुद रावण चाहते थे कि उनके कुल का उद्धार भगवान विष्णु के अवतार प्रभु श्रीराम करें। मोक्ष की प्राप्ति के लिए ही उन्होंने माता सीता का हरण किया। श्री राम की सेना से युद्ध किया और एक एक कर अपने परिवार के सभी लोगों को राम जी से लड़ने के लिए भेजा और अंत में स्वयं श्रीराम का सामना करते हुए मोक्ष की प्राप्ति की। रावण से जुड़ी कई कथाएं और रहस्य है, जो बहुत रोचक हैं। इस बार 5 अक्टूबर 2022 को दशहरा मनाया जा रहा है। दशहरा यानी विजयादशमी के दिन ही भगवान विष्णु के अवतार श्री राम ने रावण का वध किया था। रावण को दशानन भी कहते हैं क्योंकि उनके दस सिर हुआ करते थे। रावण देव नहीं थे और न दानव थे, तो एक मनुष्य के दस सिर कैसे हो सकते हैं? विजयदशमी के मौके पर जानिए रावण दशानन कैसे बने और क्या है रावण के दस सिरों का रहस्य।
 
 
रावण के दस सिरों का रहस्य

रावण के दस सिर की चर्चा रामचरित मानस में आती है। हालांकि कुछ लोग मानते हैं कि रावण के दस सिर नहीं थे। रावण मायावी थे, जो दस सिरों का भ्रम बनाते थे। हालांकि रामचरित मानस समेत कई ग्रंथों के मुताबिक, रावण के दस सिर 6 शास्त्रों और 4 वेदों के प्रतीक हैं। इसीलिए उन्हें एक महान विद्वान और अपने समय का सबसे बुद्धिमान व्यक्ति बताया गया है। मान्यता है कि रावण 65 प्रकार के ज्ञान और हथियारों की सभी कलाओं में निपुण थे। इसके अलावा रावण के 10 सिरों को दस बुराइयों का प्रतीक भी माना जाता है।

 

रावण के दस सिर की कथा  

लंकापति रावण भगवान शिव जी के परम भक्त थे। मान्यता है कि रावण ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की। लेकिन उनकी कठोर तपस्या के बाद भी भगवान शिव प्रसन्न नहीं हुए और रावण को दर्शन नहीं दिए। इसपर रावण ने अपना सिर काट कर शिवजी को अर्पण कर दिया। लेकिन उनका सिर फिर से जुड़ गया। उन्होंने फिर से अपना सिर काटा लेकिन फिर से रावण का सिर जुड़ गया। एक-एक करके रावण ने दस बार अपना सिर धड़ से अलग कर दिया और सिर दस बार जुड़ गया।

उनकी तपस्या को देखकर शिवजी प्रसन्न हो गए और रावण को वरदान दिया कि उनका वध तब तक नहीं हो सकता, जब तक कोई नाभि पर प्रहार न करे। इसके साथ ही शिवजी ने रावण को दस सिरों का भी वरदान दिया। इस तरह रावण के दस सिर हो गए और उनका नाम दशानन पड़ गया।

 

 

 

रावण के दस सिर भ्रम

लंका के राजा रावण के दस सिर होने की कई अन्य कहानियां भी प्रचलित हैं। कहा जाता है कि रावण के दस सिर नहीं थे, बल्कि दस सिर होने का भ्रम पैदा किया गया था।

 

 

रावण के दस सिर हैं बुराइयों के प्रतीक

रावण के 10 सिर को बुराइयों का प्रतीक भी मानते हैं। दस सिर का अर्थ है, काम, क्रोध, लोभ, मोह, घमंड, ईर्ष्या, मन, ज्ञान, चित्त और अहंकार।

error: Content is protected !!

Om Asttro / ॐ एस्ट्रो

आपका हार्दिक स्वागत करता है ,

ॐ एस्ट्रो से अभी जुड़े 

You have successfully subscribed to the newsletter

There was an error while trying to send your request. Please try again.

Om Asttro / ॐ एस्ट्रो will use the information you provide on this form to be in touch with you and to provide updates and marketing.
%d bloggers like this: