राशि रत्न (Gemstones) ज्योतिष जानकारों द्वारा सुझाए जाते हैं जो कि आपके जीवन में महत्वपूर्ण बदलाव लाने में सक्षम होते हैं। वास्तव में इन राशि रत्नों का संबंध प्रत्येक ग्रह से होता है और इसलिए प्रत्येक ग्रह का अपना एक विशेष राशि रत्न होता है, जो उसकी विशेषताओं से संबंधित होता है।

जब कभी भी किसी ज्योतिषी द्वारा किसी ग्रह विशेष को मजबूत बनाने के लिए उसके रत्न को पहनने का सुझाव दिया जाता है और जब हम उनके द्वारा दिए गए सुझाव के आधार पर उस राशि रत्न को धारण करते हैं तो उस ग्रह का प्रभाव धीरे-धीरे बढ़ने लगता है और हमारे जीवन में सकारात्मक बदलाव देखने को मिलते हैं। वास्तव में राशि रत्न बहुत प्रभावी होते हैं और क्योंकि इनका प्रभाव बहुत होता है तो गलत राशि रत्न पहन लेने से उनका दुष्प्रभाव भी दिखाई दे सकता है इसलिए सदैव राशि रत्न किसी योग्य ज्योतिषी से सलाह करने के उपरांत ही धारण करना चाहिए क्योंकि यह कोई साधारण पत्थर नहीं कि कोई भी धारण कर ले। इसके लिए आपकी कुंडली में उस ग्रह विशेष की शुभ स्थिति होना आवश्यक है अन्यथा आप बिना किसी सलाह के यदि कोई राशि रत्न अपनी खुशी से धारण कर लेते हैं तो वह लाभ के स्थान पर हानि भी प्रदान कर सकता है।

प्रत्येक व्यक्ति का सपना होता है कि उसके जीवन में सभी प्रकार के सुख और सुविधाओं की प्राप्ति हो। उसे जीवन में सफलता मिले और पराजय का सामना करना ना पड़े इसलिए वह जब भी किसी परेशानी में होते हैं तो ज्योतिषी के पास मार्गदर्शन हेतु जाते हैं। ज्योतिषी उनकी जन्मपत्रिका का निर्माण करके उनके ग्रह, नक्षत्र और राशियों के आधार पर उन्हें कुछ विशेष रत्न धारण करने की सलाह देते हैं। यही रत्न उनके जीवन में चमत्कारी प्रभाव दिखाते हैं और जो ग्रह उस व्यक्ति की कुंडली में शुभ होते हैं और उसको अच्छे फल प्रदान करने वाले होते हैं उनका रत्न धारण करते ही व्यक्ति के जीवन में उन ग्रहों का प्रभाव बढ़ जाता है और उसे सभी प्रकार की सुविधाएं और सफलता मिलने लगती हैं। उसके जीवन से नकारात्मकता का अंधकार छंट जाता है और सकारात्मकता का प्रकाश दिखाई देने लगता है। उसकी सोच में बदलाव आता है और वह अच्छा सोचने लगता है।

राशि रत्न का महत्व 

ज्योतिष के नजरिए से देखें तो जातक की कुंडली में अनेक ऐसे योग मिलते हैं, जिनमें व्यक्ति को उच्चतम सफलता प्राप्त हो सकती है लेकिन उन राजयोगों को बनाने वाले ग्रहों की दशा आने पर भी उन्हें राजयोग के समान शुभ फल प्राप्त नहीं हो पाते हैं क्योंकि जो ग्रह राजयोग बना रहे हैं, वे स्वयं कुंडली में मजबूत अवस्था में नहीं होते इसलिए वे  अपनी दशा आने पर भी राजयोग जैसे शुभ परिणाम देने में असमर्थ होते हैं और यही वजह है कि व्यक्ति बढ़िया समय आने पर भी पूर्ण रूप से उसका सुख नहीं उठा पाता है और परेशानियों में घिरा हुआ महसूस करता है।

उपरोक्त स्थिति होने पर वह परेशान होकर किसी ज्योतिषी के पास मार्गदर्शन की कामना से जाता है। तब ज्योतिषी उस व्यक्ति की जन्म कुंडली का अध्ययन करने के बाद उसे कुछ विशेष राशि रत्न अर्थात जेमस्टोन पहनने की सलाह देता है क्योंकि वही जेमस्टोन उस ग्रह की ऊर्जा को बढ़ा सकता है और जब वह ग्रह मजबूत अवस्था में होगा तो वह अपने दशा में उस राजयोग के अधिक परिणाम प्रदान करेगा जिससे व्यक्ति को कठिनाइयों में कमी आएगी और जीवन में सफलता की शुरुआत होगी वह उन्नति के पथ पर अग्रसर होगा और जीवन में आगे बढ़ेगा।

इस प्रकार राशि रत्न हमारे जीवन में बहुत महत्वपूर्ण प्रभाव दिखाते हैं क्योंकि यह किसी ग्रह विशेष की ऊर्जा को बढ़ाने का काम करते हैं। जिसकी वजह से हमारे जीवन में सकारात्मकता बढ़ती है और उस ग्रह विशेष के अच्छे परिणाम प्राप्त होते हैं। यही वजह है कि हमारे ज्योतिषी ग्रह के उपायों के रूप में उन ग्रहों के रत्न धारण करने का भी सुझाव देते हैं और यही हमारे जीवन में इन रत्नों का महत्व है, जो राशि रत्न के नाम से या जेमस्टोन के नाम से जाने जाते हैं। यह जेमस्टोन इतनी क्षमता रखते हैं कि किसी को भी अच्छी सफलता प्रदान कर सकते हैं केवल सही जेमस्टोन सही समय पर पहनना आवश्यक होता है।

आज हम आपको प्रमुख पांच रत्नों के बारे में बताएंगे कि वे रत्न कौन से हैं, वे किस ग्रह से संबंधित होते हैं और उन्हें धारण करने की विधि क्या होती है, इसे जानकर आपको उन राशि रत्नों के बारे में और भी अधिक जानकारी मिलेगी तथा आप यह भी समझ पाएंगे कि कौन सा रत्न किस ग्रह के लिए पहना जाता है और उसे कब और किस तरीके से पहनना चाहिए।

माणिक्य रत्न 

माणिक्य रत्न को रूबी भी कहा जाता है। यह रत्न ग्रहों के राजा सूर्य देव का रत्न है। जब किसी जातक की कुंडली में सूर्य देव शुभ स्थिति में होते हैं अर्थात वह शुभ स्थानों के स्वामी होकर विशेष रूप से केंद्र और त्रिकोण के स्वामी होते हैं और कुंडली में विशेष शुभ स्थिति में विराजमान होते हैं तो सूर्य ग्रह की क्षमता को मजबूत करने के लिए माणिक्य रत्न पहनने की सलाह दी जाती है। यह रत्न कुछ-कुछ हलके गुलाबी या मैरून रंग का होता है।

माणिक्य रत्न पहनने के लाभ 

माणिक्य रत्न व्यक्ति के आत्मविश्वास में बढ़ोतरी करता है। इसको पहनने से व्यक्ति का मनोबल ऊंचा होता है। साथ ही समाज में उसकी पद प्रतिष्ठा की वृद्धि होती है। उसके वरिष्ठ अधिकारियों और सरकारी क्षेत्र के लोगों से अच्छे संबंध स्थापित होते हैं, जिससे उन्हें जीवन में अच्छा लाभ मिलता है। सरकारी योजनाओं का लाभ उठाने और सरकारी नौकरी प्राप्त करने के लिए भी माणिक रत्न बहुत काम का रत्न साबित होता है। इसको धारण करने से व्यक्ति को अच्छे स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है। वह शत्रुओं से सुरक्षित रहता है और जीवन में स्वतंत्रता प्राप्त रहती है। यदि आप राजनीति या सरकारी क्षेत्र से जुड़े हैं तो आपको माणिक्य रत्न अवश्य धारण करना चाहिए।

माणिक्य रत्न को पहनने की विधि

माणिक्य रत्न को रविवार के दिन धारण करना चाहिए। यह रत्न रविवार को सुबह 8 बजे से पूर्व तांबे की मुद्रिका में और विशेष परिस्थिति होने पर स्वर्ण की मुद्रिका में अपनी अनामिका उंगली अर्थात रिंग फिंगर में पहनना चाहिए। आप इसको पेंडेंट या ईयररिंग के रूप में भी धारण कर सकते हैं। यदि रविवार के दिन सूर्य का नक्षत्र अर्थात कृतिका, उत्तराफाल्गुनी और उत्तराषाढ़ा में से कोई नक्षत्र विद्यमान हो तो उस समय में धारण करना और भी शुभ रहेगा तथा रविवार के दिन रवि की होरा अर्थात सूर्य की होरा में इस रत्न को धारण करने से इसकी क्षमता और भी अधिक बढ़ जाएगी। इस रत्न को एक दिन पूर्व गेहूं में दबाकर रखना चाहिए।

इस रत्न को धारण करने से पूर्व सूर्य ग्रह के बीज मंत्रॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमः का कम से कम 108 बार जाप करना चाहिए। रविवार के दिन माणिक्य रत्न को पहनने से पूर्व उसे कुछ समय के लिए कच्चे दूध और गंगाजल में भिगोकर रख दें। उसके बाद उसे शुद्ध जल से साफ करें। तत्पश्चात गंगाजल, शहद और शर्करा युक्त घोल में रखकर छोड़ दें। उसके बाद सूर्य देव को नमस्कार करते हुए उन्हें तांबे के पात्र से अर्घ्य दें और प्रार्थना करें कि वह जीवन की सभी समस्याओं को दूर करें और आप उनके रत्न माणिक्य को धारण करने जा रहे हैं। यह आपके लिए शुभ और मंगलकारी साबित हो और आपके जीवन की समस्याओं को दूर करें। इस शुभकामना के बाद सूर्य देव अथवा विष्णु भगवान जी को प्रणाम करते हुए इस रत्न को धारण कर सकते हैं। तत्पश्चात बैल को गेहूं खिलाएं और अपने पिताजी के चरण स्पर्श करें।

हीरा रत्न 

हीरा सबसे महंगे रत्नों में से एक माना जाता है। यह शुक्र ग्रह का रत्न है और शुक्र ग्रह की शुभता को प्राप्त करने के लिए हीरा रत्न धारण करने का सुझाव योग्य ज्योतिषियों द्वारा प्रदान किया जाता है। जिस कुंडली में शुक्र योगकारक हो, केंद्र अथवा त्रिकोण भाव का स्वामी हो और केंद्र अथवा त्रिकोण भाव में स्थित होकर शुभ ग्रहों से संबंध बनाए तो वहां हीरा रत्न धारण करना शुक्र के प्रभाव को बढ़ाने में सहायक माना जाता है। यह पारदर्शी और चमकदार होता है।

हीरा रत्न पहनने के लाभ 

हीरा रत्न धारण करने से जातक के जीवन में सभी भौतिक सुख-सुविधाओं की प्राप्ति होती है। उसे ऐशो आराम का जीवन मिलता है। उसकी आर्थिक चुनौतियां दूर होती हैं। वह लोगों के आकर्षण का केंद्र बन जाता है। अभिनय और कलात्मक क्षेत्रों में काम करने वालों के लिए हीरा रत्न बहुत ही उपयोगी होता है। यह प्रेमी युगल के बीच प्रेम की बढ़ोतरी भी करता है और शादी के बाद दांपत्य जीवन में भी प्रेम बढ़ाने का कार्य करता है। जीवन साथी के साथ अंतरंग संबंधों में बढ़ोतरी के लिए भी हीरा रत्न उपयोगी होता है। इसको धारण करने से व्यक्ति की अलग ही आभा होती है और लोग उसके प्रति आकर्षित रहते हैं।

हीरा रत्न को पहनने की विधि

हीरा एक बहुमूल्य रत्न है। यह शुक्र ग्रह का रत्न है, जो जीवन में सभी भौतिक सुख सुविधाओं को प्रदान करने वाले ग्रह है। हीरा रत्न को शुक्रवार के दिन शुक्रवार की होरा में चांदी की मुद्रिका में अपनी अनामिका अंगुली अर्थात रिंग फिंगर में धारण करना अत्यंत शुभ होता है।  आप इसको पेंडेंट या ईयररिंग के रूप में भी धारण कर सकते हैं। यह शुक्रवार शुक्ल पक्ष के दौरान आए तो उत्तम होता है। इसको संध्याकाल में धारण करना और भी अधिक शुभकारी होता है तथा शुक्रवार के दिन शुक्ल पक्ष के दौरान यदि शुक्र के नक्षत्र की प्राप्ति हो जाए अर्थात भरणी, पूर्वा फाल्गुनी और पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र में से कोई नक्षत्र विद्यमान हो तो उस समय पर इस रत्न को धारण करना अत्यंत शुभ हो जाता है। कुछ विशेष परिस्थिति में वाइट गोल्ड अर्थात सफेद स्वर्ण अथवा प्लैटिनम की मुद्रिका का भी प्रयोग किया जा सकता है। इस रत्न को एक दिन पूर्व चावल में दबाकर रखना चाहिए।

इस रत्न को धारण करने से पूर्व शुक्र ग्रह के बीज मंत्रॐ द्रां द्रीं द्रौं सः शुक्राय नमः का कम से कम 108 बार जाप करना चाहिए। शुक्रवार के दिन हीरे को पहनने से पूर्व इसे शुद्ध जल, गंगाजल और गो दुग्ध से शुद्ध करें। उसके बाद इसे धूप और दीप दिखाएं तथा शुक्र देव और माता लक्ष्मी से प्रार्थना करते हुए कि आप हीरा रत्न को पहन रहे हैं, यह आपके लिए सफलता दायक और सुख सुविधाओं से युक्त करने वाला हो। ऐसी प्रार्थना करते हुए माता महालक्ष्मी के चरणों से स्पर्श कराकर इस रत्न को धारण कर सकते हैं। उसके पश्चात छोटी कन्याओं को कुछ मीठा खाने के लिए दें और उनके चरण छूकर उनका आशीर्वाद लें।

नीलम रत्न

नीलम रत्न बहुत ही प्रभावशाली रत्न माना जाता है क्योंकि इसका प्रभाव शीघ्र ही दिखाई देता है इसलिए इस के चयन में बहुत ही सावधानी बरतनी चाहिए। नीलम रत्न कर्मफल दाता शनिदेव का विशेष रत्न है। इस कुंडली में शनि देव योगकारक ग्रह हों अथवा लग्न के स्वामी हों या फिर केंद्र व त्रिकोण भाव के स्वामी हों और शुभ स्थिति में कुंडली में शुभ कारक बनते हुए विराजमान हों तो शनिदेव की कृपा प्राप्ति के लिए नीलम रत्न धारण करने की सलाह दी जाती है। यह रत्न नीले रंग की आभा लिए हुए होता है।

नीलम रत्न पहनने के लाभ 

नीलम रत्न धारण करने से जातक का आलस्य दूर होता है और वह कर्मशील बनता है। उसे मेहनत करने में आनंद आता है और उसी से उसकी तरक्की होती है। यह व्यक्ति को अनुशासित बनाता है और कर्म करने के लिए प्रेरित करता है। यह व्यक्ति के जीवन में आशा का संचार करता है और उसे उच्च पद प्रतिष्ठा प्रदान करता है। उसको विभिन्न प्रकार की नकारात्मक ऊर्जा उसे बचाता है तथा जीवन में सदैव कुछ ना कुछ करते हुए आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता है।

नीलम रत्न को पहनने की विधि

जैसा कि ऊपर बताया गया है कि नीलम रत्न बहुत ही प्रभावशाली होता है इसलिए यह बहुत शीघ्र ही अपने प्रभाव दिखाने लगता है। यही कारण है कि हर व्यक्ति को नीलम रत्न सटीक नहीं बैठता इसलिए इसकी पहले पहचान करनी चाहिए कि यह आपके लिए शुभ होगा या नहीं। इसके लिए इस रत्न को शुक्रवार के दिन रात्रि के समय सोते समय अपने सिरहाने रख कर सो जाएं। यदि रात्रि में कोई बुरा सपना आए या आपके साथ कोई बुरी घटना हो तो समझ लीजिए कि यह रत्न आपके लिए ठीक नहीं है और इसे तुरंत वापस कर दें और धारण ना करें जबकि यदि आपको कोई अच्छा सा सपना आए। आपके साथ कुछ अच्छा हो अथवा सब कुछ सामान्य रहे तो आप इस रत्न को धारण कर सकते हैं। इस रत्न को शनिवार के दिन संध्या काल के बाद शनि के नक्षत्र में अर्थात पुष्य नक्षत्र, अनुराधा नक्षत्र अथवा उत्तराभाद्रपद नक्षत्र में धारण करना अत्यंत लाभकारी साबित होता है। यदि धारण करते समय शनि की होरा भी मिल जाए तो और भी शुभ होता है। इस रत्न को पंचधातु अथवा अष्ट धातु की मुद्रिका में धारण करना चाहिए। आप इसको पेंडेंट के रूप में भी धारण कर सकते हैं। विशेष परिस्थिति में लोहे की मुद्रिका में भी धारण किया जा सकता है। इस रत्न को एक दिन पूर्व काली उड़द में दबाकर रखना चाहिए।

इस रत्न को धारण करने से पूर्व शनि ग्रह के बीज मंत्र “ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः का कम से कम 108 बार जाप करना चाहिए। इस रत्न को पहनने से पूर्व गंगाजल, शुद्ध जल और शहद और शर्करा को मिलाकर उससे इसे शुद्ध कर लें और शनि देव के चरणों से स्पर्श कराकर तथा भगवान शिव का ध्यान करते हुए इस रत्न को पहनने से पूर्व प्रार्थना करें कि यह नीलम रत्न धारण करने जा रहे हैं, यह आप और आपके परिवार के लिए शुभ और मंगलकारी रहे। इस प्रार्थना के साथ इस रत्न को धारण करना चाहिए रत्न को धारण करने के बाद चींटियों को आटा डालना चाहिए और दिव्यांग जनों को भोजन कराना चाहिए।

पन्ना रत्न 

पन्ना रत्न बुध ग्रह का रत्न होता है और बुध ग्रह की विशेष कृपा पाने के लिए इस रत्न को धारण किया जाता है। यह हरे रंग का रत्न होता है। यदि किसी कुंडली में बुध ग्रह केंद्र अथवा त्रिकोण भाव का स्वामी हो और कुंडली के केंद्र अथवा त्रिकोण भाव में अथवा शुभ स्थिति में विराजमान हो तो बुध ग्रह की क्षमता को बढ़ाने के लिए पन्ना रत्न पहनना चाहिए।

पन्ना रत्न पहनने के लाभ 

पन्ना रत्न पहनने से स्मरण क्षमता की बढ़ोतरी होती है। जातक की बुद्धि का विकास होता है। उसे शिक्षा से संबंधित कार्य अर्थात पढ़ने लिखने में बिजनेस करने में, लेखन में, पत्रकारिता में अच्छा लाभ होता है। यह आपको हाजिर जवाब और वाकपटु भी बनाता है तथा आपके अंदर व्यापार कौशल को बढ़ाता है। जहां कहीं भी हिसाब किताब का काम हो, वहां आपको पन्ना रत्न अवश्य धारण करना चाहिए। इसके अतिरिक्त गणितीय योग्यता और अभिनय तथा फिल्म के क्षेत्रों में जोड़ने के लिए भी बुध ग्रह के इस रत्न का उपयोग सर्वाधिक उपयोगी रहता है।

पन्ना रत्न को पहनने की विधि

शुक्ल पक्ष के बुधवार के दिन संध्या होने से पूर्व सोने की मुद्रिका अर्थात सोने की अंगूठी में जड़वा कर पन्ना रत्न को अपनी कनिष्ठिका अंगुली अर्थात लिटिल फिंगर में चांदी की मुद्रिका में धारण करना अत्यंत लाभकारी साबित होता है। विशेष स्थिति में इस रत्न को वाइट गोल्ड अर्थात सफेद स्वर्ण में भी धारण किया जा सकता है। आप इसको पेंडेंट या ईयररिंग के रूप में भी धारण कर सकते हैं। यदि बुधवार के दिन बुध के ही नक्षत्र अर्थात अश्लेषा, ज्येष्ठा और रेवती में से कोई नक्षत्र आ रहा हो तो यह अत्यंत शुभ होता है। इसके साथ ही बुधवार के दिन बुध की होरा में पन्ना रत्न धारण करना और भी अधिक शुभ हो जाता है। इस रत्न को एक दिन पूर्व साबुत मूंग की दाल में दबाकर रखना चाहिए।

इस रत्न को धारण करने से पूर्व बुध ग्रह के बीज मंत्र ॐ ब्रां ब्रीं ब्रौं सः बुधाय नमः का कम से कम 108 बार जाप करना चाहिए। पन्ना रत्न को धारण करने से पूर्व कच्चे दूध में कुछ समय के लिए भिगो कर रखें। उसके बाद जब आपको यह रत्न बताए गए समय अनुसार धारण करना हो तो उस कच्चे दूध में से उस अंगूठी को निकालकर उस को स्वच्छ जल, गंगाजल, शहद और शक्कर के घोल में डालकर शुद्ध कर लें और धूप दीप दिखाकर बुध ग्रह से हाथ जोड़कर प्रार्थना करें कि आप उनके रत्न पन्ना को धारण करने जा रहे हैं। आपके लिए यह रत्न शुभ और सफलतादायक साबित हो और बुध देव आपके जीवन की समस्याओं को दूर करें। इसके बाद उपरोक्त बताए गए मंत्र का जाप करते हुए भगवान विष्णु के चरणों से स्पर्श कराते हुए इस रत्न को धारण कर लें तथा इसके बाद साबुत मूंग की दाल, जो एक दिन पूर्व से पानी में भिगोकर रखी गई हो, अपने हाथों से गौ माता को खिलाएं।

पुखराज रत्न 

देव गुरु बृहस्पति नैसर्गिक रूप से एक शुभ ग्रह हैं और उनकी क्षमता को बढ़ाने के लिए पुखराज रत्न धारण करने की सलाह दी जाती है। यह रत्न पीले रंग की आभा लिए हुए होता है। जब देव गुरु बृहस्पति कुंडली के शुभ भावों के स्वामी हैं और शुभ स्थानों में विराजमान हो तो उनकी कृपा दृष्टि को प्राप्त करने के लिए और कुंडली में बृहस्पति की स्थिति को मजबूत बनाने के लिए पुखराज रत्न धारण किया जाता है।

पुखराज रत्न पहनने के लाभ 

यह बहुत प्रभावशाली रत्न है। इस रत्न को पहनने से आपको ईश्वर की कृपा का एहसास होता है। यह विशेष रूप से आर्थिक परेशानियों को दूर करने में सहायक होता है तथा विवाह में आ रही बाधाओं को दूर करता है। विवाह के उपरांत दांपत्य जीवन को मजबूत बनाने में भी मदद करता है और संतान प्राप्ति में भी शुभ रहता है। पुखराज पहनने वाले व्यक्ति की आर्थिक समस्याएं दूर होती हैं और जीवन में तरक्की का रास्ता खुलता है। व्यक्ति को मान सम्मान, आर्थिक लाभ और अच्छी आयु की प्राप्ति होती है।

पुखराज रत्न को पहनने की विधि

पुखराज रत्न को शुक्ल पक्ष के बृहस्पतिवार के दिन दोपहर में 12 से 1 बजे के बीच स्वर्ण मुद्रिका में अर्थात सोने की अंगूठी में जड़वा कर अपनी तर्जनी अंगुली अर्थात इंडेक्स फिंगर में धारण करना चाहिए। यदि उस दिन बृहस्पति का नक्षत्र पुनर्वसु, विशाखा और उत्तरा भाद्रपद में से कोई नक्षत्र मौजूद हो तो और भी शुभ होता है तथा बृहस्पतिवार के दिन बृहस्पति की होरा में यह रत्न धारण करना और भी अधिक शुभ फलदायी होता है। आप इसको पेंडेंट के रूप में भी धारण कर सकते हैं। यदि गुरु पुष्य नक्षत्र के दिन इस रत्न को धारण किया जाए तो इसकी क्षमता और भी अधिक बढ़ जाती है। यदि स्वर्ण की मुद्रिका बनवाना संभव न हो तो पीतल की मुद्रिका भी बनवा सकते हैं। इस रत्न को एक दिन पूर्व चने की दाल अथवा देसी घी में भिगोकर रख देना चाहिए।

इस रत्न को धारण करने से पूर्व बृहस्पति ग्रह के बीज मंत्र ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं सः गुरुवे नमः का कम से कम 108 बार जाप करना चाहिए। इस रत्न को पहनने से पूर्व स्नानादि से निवृत्त होकर स्वच्छ हो जाएं और कच्चे दूध, गंगाजल, शहद से इस रत्न को धोकर शुद्ध करें और धूप दीप दिखाकर देव गुरु बृहस्पति का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए हाथ जोड़कर उनसे प्रार्थना करें कि आप उनके रत्न पुखराज को धारण करने जा रहे हैं यह रत्न आपके लिए शुभ और मंगलकारी साबित हो और आपको देव गुरु बृहस्पति जो की कृपा मिले। इसके बाद ऊपर बताए गए मंत्र का जाप करें। इस मुद्रिका को भगवान विष्णु के चरणों से स्पर्श कराकर इस रत्न को धारण करें।

इस प्रकार हम यह जान सकते हैं कि ऊपर बताए गए पांच प्रमुख रत्न अर्थात माणिक्य रत्न, हीरा रत्न, नीलम रत्न, पन्ना रत्न और पुखराज रत्न को कब, कैसे और किस प्रकार धारण किया जा सकता है और उनसे संबंधित ग्रहों को मजबूत बनाकर जीवन में उन से लाभ प्राप्त किया जा सकता है।

 

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