स्वगृहाद् द्वादाशभागाः द्रेष्काणाः प्रथमपञ्चनवपानाम् |

होरे विषमेऽर्केन्द्रोः समराशौ चन्द्रतीक्ष्णांशोः || ९ ||  

 

मेषादि राशियों में तद् – तद्  राशि से ही आरम्भकर १२ , १२ राशियों के द्वादशांश होते है | अर्थात् मेष में प्रथम द्वादशांश ( २|३०  अंश तक )  मेष का आगे ५|०० अंश तक वृष का इत्यादि | तथा प्रत्येक राशि में ३ द्रेष्काण ( तृतीयांश ) होते है | उनमे प्रथम उसी राशि का , द्वितीय द्रेष्काण उस राशि से ५ वां का , तृतीय द्रेष्काण अपने से नवमी राशि के स्वामी का होता है | एवं विषम ( मेष , मिथुन आदि ) राशियों  में प्रथम होरा सूर्य की , द्वितीय चंद्रमा की और सम ( वृष , कर्क आदि  ) राशियों में प्रथम चंद्रमा की , द्वितीय सूर्य की होरा होती है || ९ ||

   होरा शब्द से यहाँ राशि का आधा ( १५ अंश ) समझना |

विशेष – गर्भाधान से जन्मकाल ज्ञान के लिए चंद्रमा के “द्वादशांश” का प्रयोजन पड़ता है | चोर आदि  ( स्त्री – पुरुष ) के स्वरूप ज्ञान में ‘द्रेष्काण’ का , तथा जातक मृदुल स्वभाव वाला है अथवा तेजस्वी है | इसका ज्ञान “होरा” द्वारा ज्ञात किया जाता है |

 

 

 

 

|| लघुजातक ||

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जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी। 
दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते।।
 
ॐ एस्ट्रो के सभी पाठको को शारदीय नवरात्रि और विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनाये ||

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