Whatever emotion a person remembers while leaving the body, he definitely attains that feeling.
अध्याय 8 : भगवत्प्राप्ति

श्लोक 8 . 6

यं_यं_वापि_स्मरन्भावं_त्यजत्यन्ते_कलेवरम् |
तं_तमेवैति_कौन्तेय_सदा_तद्भावभावितः || ६ ||

यम् यम् – जिस; वा अपि – किसी भी; स्मरन् – स्मरण करते हुए; भावम् – स्वभाव को; त्यजति – परित्याग करता है; अन्ते – अन्त में; कलेवरम् – शरीर को; तम् तम् – वैसा ही; एव – निश्चय ही; एति – प्राप्त करता है; कौन्तेय – हे कुन्तीपुत्र; सदा – सदैव; तत् – उस; भाव – भाव; भावितः – स्मरण करता हुआ |

भावार्थ

हे कुन्तीपुत्र! शरीर त्यागते समय मनुष्य जिस-जिस भाव का स्मरण करता है, वह उस उस भाव को निश्चित रूप से प्राप्त होता है |

तात्पर्य

यहाँ पर मृत्यु के समय अपना स्वभाव बदलने की विधि का वर्णन है | जो व्यक्ति अन्त समय कृष्ण का चिन्तन करते हुए शरीर त्याग करता है, उसे परमेश्र्वर का दिव्य स्वभाव प्राप्त होता है | किन्तु यह सत्य नहीं है कि यदि कोई मृत्यु के समय कृष्ण के अतिरिक्त और कुछ सोचता है तो उसे भी दिव्य अवस्था प्राप्त होती है | हमें इस बात पर विशेष ध्यान देना चाहिए | तो फिर कोई मन की सही अवस्था में किस प्रकार मरे? महापुरुष होते हुए भी महाराज भरत ने मृत्यु के समय एक हिरन का चिन्तन किया, अतः अगले जीवन में हिरन के शरीर में उनका देहान्तरण हुआ | यद्यपि हिरन के रूप में उन्हें अपने विगत कर्मों की स्मृति थी, किन्तु उन्हें पशु शरीर धारण करना ही पड़ा | निस्सन्देह मनुष्य के जीवन भर के विचार संचित होकर मृत्यु के समय उसके विचारों को प्रभावित करते हैं, अतः उस जीवन से उसका अगला जीवन बनता है | अगर कोई इस जीवन में सतोगुणी होता है और निरन्तर कृष्ण का चिन्तन करता है तो सम्भावना यही है कि मृत्यु के समय उसे कृष्ण का स्मरण बना रहे | इससे उसे कृष्ण के दिव्य स्वभाव को प्राप्त करने में सहायता मिलेगी | यदि कोई दिव्यरूप से कृष्ण की सेवा में लीन रहता है तो उसका अगला शरीर दिव्य (आध्यात्मिक) ही होगा, भौतिक नहीं | अतः जीवन के अन्त समय अपने स्वभाव को सफलतापूर्वक बदलने के लिए हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे | हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे का जप सर्वश्रेष्ठ विधि है |

आचार्य ओमप्रकाश त्रिवेदी

Whatever emotion a person remembers while leaving the body, he definitely attains that feeling.

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