सनातन धर्म में नवरात्रि का त्योहार एक बेहद ही महत्वपूर्ण त्योहार माना जाता है। 7 अक्टूबर 2021 गुरुवार से शारदीय नवरात्रि प्रारंभ हो चुकी है। इस वर्ष शारदीय नवरात्रि 8 दिन की होने वाली है क्योंकि तृतीय और चतुर्थी तिथि एक ही दिन मनाई जाएगी अर्थात 9 अक्टूबर 2021 शनिवार के दिन मनाई जाएगी। यही वजह है कि इस वर्ष की नवरात्रि और भी ज्यादा खास और महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

इस वर्ष नवरात्रि पर वैधृति योग, सौभाग्य योग, और छह रवि योग का शुभ संयोग भी बन रहा है। इसके अलावा नवरात्रि की शुरुआत चित्रा नक्षत्र में हुई है जिसको और भी ज्यादा शुभ माना जाता है। कहा जाता है ऐसी स्थिति में इन दिनों कोई भी काम करना सफल साबित होता है। साथ ही यदि इन दिनों में जमीन, वाहन, या फर्नीचर जैसी चीजें खरीदी जाए तो यह भी शुभ रहता है। इसके अलावा कुछ राशियों पर इस वर्ष नवरात्रि की विशेष कृपा भी देखने को मिलने वाली है।


नवरात्रि तृतीया चतुर्थी एक दिन
इस वर्ष 9 अक्टूबर 2021 शनिवार के दिन सिर्फ नवरात्रि की तृतीया और चतुर्थी तिथि ही नहीं मनाई जाएगी बल्कि इस दिन सुबह 6 बज कर 18 मिनट से शाम 4 बजकर 47 मिनट तक रवि योग रहने वाला है। वैदिक ज्योतिष में रवि योग को नए घर में प्रवेश करने (गृह प्रवेश), कार खरीदने, प्रॉपर्टी डीलिंग, दुकान खोलने, आदि के लिए एक शुभ योग माना गया है। इसके साथ ही यह योग सभी तरह की अशुभता को दूर करने के लिए भी जाना जाता है। रवि योग में कई नामचीन हस्तियों का जन्म भी हुआ है जैसे श्री अरबिंदो, जयप्रकाश नारायण, और भीमसेन जोशी, कुछ ऐसे जाने-माने लोग हैं जिनका रवि योग में जन्म हुआ है।

नवरात्रि तीसरा दिन: तृतीया तिथि 8 अक्टूबर को सुबह 10 बजकर 48 मिनट से 9 अक्टूबर को सुबह 7 बजकर 51 मिनट तक।

नवरात्रि चौथा दिन: चतुर्थी तिथि का समय 9 अक्टूबर को सुबह 7 बजकर 48 मिनट से 10 अक्टूबर को सुबह 4 बजकर 55 मिनट तक बना है।

नवरात्रि के तीसरे दिन करें माँ चंद्रघंटा की पूजा
नवरात्रि का तीसरा दिन शांति, धैर्य, और पवित्रता का दिन होता है। नवरात्रि का तीसरा दिन माँ चंद्रघंटा को समर्पित होता है जिन्हें भगवान शिव की शक्ति का रूप माना जाता है। माँ चंद्रघंटा माँ पार्वती का विवाहित रूप भी मानी जाती है। कहते हैं जो लोग माँ चंद्रघंटा की विधिवत और श्रद्धा भाव से पूजा करते हैं माँ उन्हें हर प्रकार की नकारात्मक ऊर्जा और बुरी शक्तियों से बचाती हैं। माँ चंद्रघंटा के माथे पर आधा चंद्र (मंदिर की घंटी जैसा प्रतीत होता है) होता है।

माँ चंद्रघंटा शेर पर सवारी करती हैं। माँ का यह रूप दिखाता है कि कैसे एक तरफ वह अपने भक्तों के लिए निर्मल और सौम्य हैं और वहीं दूसरी तरफ उनका रौद्र रूप उनके दुश्मनों को भयभीत करने के लिए पर्याप्त है।

माँ चंद्रघंटा की पूजा करने से माँ अपने भक्तों को समृद्धि, दिव्य कृपा और साहस का आशीर्वाद प्रदान करती हैं। माँ चंद्रघंटा को देवी दुर्गा के सबसे शक्तिशाली रूपों में से एक माना जाता है और इन्हें दुख और कष्टों से मुक्ति देने के लिए भी जाना जाता है ।

देवी चंद्रघंटा: ज्योतिषीय महत्व
नवरात्रि की तृतीया तिथि को चंद्रघंटा देवी की पूजा की जाती है और माँ का नाम दो शब्दों से मिलकर बना है, चन्द्र और घंटा अर्थात चन्द्रमा जो माँ के माथे पर घंटी की तरह लटका है। वह माता पार्वती का विवाहित अवतार हैं और तीसरे दिन माँ की पूजा की जाती है। सभी नौ ग्रहों में माता शुक्र ग्रह को नियंत्रित करने के लिए जानी जाती हैं।

देवी चंद्रघंटा: पूजन विधि
देवी की मूर्ति को चौकी या टेबल पर रखकर केसर, गंगाजल (पवित्र जल) और केवडा (पुष्प जल) से स्नान कराएं। इसके बाद देवी को सुनहरे रंग के कपड़ों से सजाएं। माँ चंद्रघंटा को पीले रंग के फूल और कमल अर्पित करें। इस दिन की पूजा में माँ को प्रसाद में मिठाई, पंचामृत और मिश्री (शैल चीनी) अवश्य अर्पित करें।

देवी चंद्रघंटा पूजा के लाभ
कष्टों को दूर करती हैं।
जीवन में किसी भी दुख या कठिनाई का समाधान प्रदान करती हैं।
माँ की पूजा से सौभाग्य, शांति और समृद्धि मिलती है।
माँ चंद्रघंटा की पूजा से साहस और ताकत में वृद्धि होती है।
देवी चंद्रघंटा की पूजा में उपयोग की जाने वाली अनूठी सामग्री
सफेद फूल
दूध या दही
सफेद कपड़ा
मधु/शहद
लाल सेब
पूजा अनुष्ठान के बाद इस दिन दान करें ये चीज़ें
नवरात्रि के तीसरे दिन की पूजा के बाद पूजा के सकारात्मक परिणाम प्राप्त करने के लिए अन्न,फल, वस्त्र, पैसों, किसी ब्राह्मण को भोजन कराना, धातु, आदि का दान करना बेहद ही उत्तम और शुभ माना गया है।

दुर्गा अवतार देवी चंद्रघंटा और चंद्र ग्रह के साथ उनका संबंध
माँ चंद्रघंटा शेर पर सवारी करती हैं। इसके साथ ही उनके माथे पर अर्थ चंद्र का मुकुट सुसज्जित है। देवी चंद्रघंटा के 4 बाएँ हाथों में त्रिशूल, गाडा, तलवार और कमंडल होते हैं और पांचवा बायाँ हाथ वरद मुद्रा में होता है। इसके अलावा माता अपने दाहिने चार हाथों में कमल, तीर, धनुष, और जप की माला लिए हुए हैं और माता का पांचवा हाथ अभय मुद्रा में होता है।

कहा जाता है यदि नवरात्रि के तीसरे दिन सही विधि के साथ माँ चंद्रघंटा की पूजा की जाए तो व्यक्ति के जीवन में चंद्रमा के सकारात्मक प्रभाव मिलने लगते हैं क्योंकि माँ चंद्रघंटा रचनात्मकता, तेज दिमाग और अच्छे कर्म आदि का प्रतीक मानी गई हैं।

शासित ग्रह: ऐसा माना जाता है कि शुक्र ग्रह देवी चंद्रघंटा द्वारा शासित होता है। ऐसे में माँ चंद्रघंटा की विधिवत पूजा करने से शुक्र ग्रह से संबंधित सभी बाधाएं और शुक्र ग्रह का दुष्प्रभाव कम किये जा सकते हैं। जिन लोगों पर शुक्र ग्रह की अंतर्दशा चल रही है या जो वृषभ और तुला राशि के जातक है उन्हें माँ चंद्रघंटा की पूजा से विशेष लाभ प्राप्त हो सकता है। सुख, शांति, और समृद्धि लाने के लिए इस दिन शुक्र ग्रह से संबंधित रत्न को क्रियाशील करें।



नवरात्रि की चतुर्थी तिथि पर करें माँ देवी कूष्मांडा की पूजा
देवी कुष्मांडा को ‘मुस्कुराती हुई देवी’ भी कहा जाता है और नवरात्रि के चौथे दिन इनकी पूजा का विधान बताया गया है। माँ कुष्मांडा से संबंधित नवरात्रि का चौथा दिन जुनून, क्रोध, और शुभता का प्रतीक माना गया है।

माँ कुष्मांडा माँ दुर्गा का हसमुख रूप कही जाती हैं और माता के बारे में यह भी माना जाता है कि वह संपूर्ण ब्रह्मांड के रचयिता है। माता कुष्मांडा के नाम से भी यह बात सिद्ध होती है। माता के नाम में ‘कू’ शब्द का अर्थ होता है ‘थोड़ा’ और ‘उषम’ का अर्थ होता है ‘ऊर्जा या गर्मी’ और तीसरा शब्द ‘अंडा’ का अर्थ होता है ‘अंडा’। ऐसे में इसे मिलाने से माता के नाम का अर्थ निकलता है ‘छोटा ब्रह्मांडीय अंडा’ जिसे हम अपने ब्रह्मांड के नाम से जानते हैं।

देवी कूष्मांडा को दिव्य शक्ति का रूप माना जाता है और कहते हैं ब्रह्मांड के रचयिता माँ कुष्मांडा ही हैं। देवी देवी कूष्मांडा ने ही अंधकार को दूर भगाकर तीन दिव्य देवियों और देवताओं की रचना की थी। देवी कूष्मांडा बाघ की सवारी करती हैं और उनके पास कुल 8 हाथ हैं। इन अलग-अलग हाथों में माँ ने एक विशेष वस्तु या हथियार लिया हुआ है।

माँ कुष्मांडा के एक हाथ में धनुष और तीर है, एक हाथ में कमल है, एक हाथ में गदा है, एक हाथ में अमृत का पात्र है, एक हाथ में माला है, एक हाथ में चक्र है, और एक हाथ में कमंडल है। माँ कुष्मांडा एक दिव्य शक्ति, शाश्वत होने के साथ-साथ ऊर्जा का स्त्रोत थी मानी गई हैं। देवी कुष्मांडा अपने भक्तों को शक्ति, बुद्धि, समृद्धि का आशीर्वाद देती हैं और उनके जीवन की समस्त परेशानियों और तकलीफों से उनकी रक्षा भी करती हैं।

देवी कुष्मांडा: ज्योतिषीय महत्व
देवी कुष्मांडा को माँ दुर्गा का चौथा रूप माना जाता है और नवरात्रि के चौथे दिन इनकी पूजा की जाती है। कहा जाता है जब इस ब्रह्मांड का अस्तित्व नहीं था और हर तरफ अंधकार फैला हुआ था उस वक्त देवी कुष्मांडा ने ही अपनी मुस्कान से इस ब्रह्मांड की रचना की थी इसीलिए उन्हें ब्रह्मांड की रचयिता के रूप में भी जाना जाता है।

देवी कुष्मांडा सभी सुखों की दाता हैं। माँ कुष्मांडा की पूजा से व्यक्ति को सभी प्रकार की बीमारियों से मुक्ति मिलती है और जीवन में सुख और समृद्धि के मार्ग प्रशस्त होते हैं इसीलिए भक्तों को शुद्ध मन और एकाग्र होकर माँ की आराधना और पूजा करनी चाहिए। माँ कुष्मांडा की पूजा करने से व्यक्ति की बीमारियां और दुख खत्म होते हैं और जीवनकाल, नाम, शक्ति, और स्वास्थ्य में सुधार होता है।

शासित ग्रह: ऐसा माना जाता है कि देवी कूष्मांडा सूर्य ग्रह को दिशा और ऊर्जा प्रदान करती हैं। इसीलिए सूर्य ग्रह पर माँ कुष्मांडा का शासन या आधिपत्य होता है। यही वजह है कि देवी कूष्मांडा की पूजा करने से सूर्य ग्रह के सभी दुष्प्रभावों को खत्म किया जा सकता है। इसके अलावा यदि इस दिन आप रूबी रत्न को क्रियाशील करते हैं तो इससे आपको समाज में नाम और प्रसिद्धि हासिल होती है।

देवी कुष्मांडा पूजन विधि
नवरात्रि पूजा के चौथे दिन कलश के पास माँ कुष्मांडा की तस्वीर या मूर्ति रखें। माता की तस्वीर के समक्ष लाल फूल, फल, मिठाई, इत्यादि का भोग लगाएं। इसके बाद माँ कुष्मांडा के मंत्र का जाप करें।

ॐ देवी कुष्मांडा नमस्तसि:

या देवी सर्वभूतेषु माँ कुष्मांडा रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:

माँ कुष्मांडा पूजा के लाभ
माँ का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
सभी मनोवांछित इच्छाओं की पूरी होती है।
जीवन से अंधकार दूर होता है और जीवन में सद्भाव स्थापित होता है।
आंतरिक शक्ति, अच्छे स्वास्थ्य और समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
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देवी कुष्मांडा की पूजा में उपयोग की जाने वाली अंगूठी सामग्री
खुमार का पेठा
कद्दू
सिन्दूर
गुलाब
गुलदाउदी फूल
हरी इलायची
सौंफ के बीज
लाल आटा
मालपुआ
पूजा अनुष्ठान के बाद इस दिन दान करें ये चीजें
नवरात्रि के चौथे दिन की पूजा के बाद पूजा के सकारात्मक परिणाम प्राप्त करने के लिए रत्न, कपड़ों का दान करें, दक्षिणा दें, जानवरों और पक्षियों को खाना खिलाएं और किसी ब्राह्मण को खाना खिलाएं।

शनिवार के दिन पड़ रही है नवरात्रि की द्वितीय और चतुर्थी तिथि: शनि के दुष्प्रभावों को करें दूर
शारदीय नवरात्रि की तृतीया और चतुर्थी तिथि शनिवार के दिन पड़ रही है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार नवरात्रि के दौरान विशेष पूजा पाठ करके ग्रहों के अशुभ प्रभाव को कम या शांत किया जा सकता है। ज्योतिष में शनि ग्रह के महत्व के बारे में हर कोई जानता है, जिससे अक्सर जातक परेशान रहते हैं। जानते हैं शनि से संबंधित दोष से छुटकारा पाने के लिए आप इस दिन क्या कुछ उपाय कर सकते हैं।

शनि की साढ़ेसाती, ढैया, या शनि के दुष्प्रभाव को दूर करने के लिए इस दिन माँ चंद्रघंटा और कुष्मांडा माता की पूजा करें। इसके अलावा इस दिन के नहाने के पानी में यदि आप काले तिल डालकर उससे स्नान करते हैं तो भी आपको शनि ग्रह के दुष्परिणाम दूर करने में मदद प्राप्त होगी। इसके अलावा नवरात्रि की शाम की पूजा करने के बाद इस दिन पीपल के पेड़ के नीचे दीपक अवश्य जलाएं। इसके साथ ही आप शनि चालीसा, हनुमान चालीसा का पाठ भी कर सकते हैं।

शनि की साढ़ेसाती और ढैय्या से छुटकारा पाने के लिए नवरात्रि में अवश्य करें ये उपाय
यदि आप शनि ग्रह की ढैया या साढ़ेसाती से परेशान हैं तो नवरात्रि की तृतीय चतुर्थी तिथि के दिन शनिवार को शनि चालीसा और हनुमान चालीसा का पाठ करें।
इसके अलावा नवरात्र के दौरान पड़ने वाले शनिवार के दिन लोहे की वस्तुओं, सरसों का तेल, तिल, उड़द की दाल, काले कपड़े, आदि का दान करना भी आपके लिए शुभ साबित हो सकता है।
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