हिंदू कैलेंडर के अनुसार, पार्श्व एकादशी भाद्रपद महीने के शुक्ल पक्ष के ग्यारहवें दिन पर पड़ती है।  इसलिए, इस अवसर को ‘एकादशी’ नाम दिया गया है। एकादशी का व्रत हिंदू धर्म में मानने वाले लोगों के लिए बेहद ही शुभ और फलदायी व्रत माना गया है। वहीं ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार, पार्श्व एकादशी अगस्त या सितंबर के महीने में मनाई जाती है।

पार्श्व एकादशी “दक्षिणायन पुण्यकालम” के दौरान मनाई जाती है। यह देवताओं के रात के समय का प्रतीक है। यह हिंदू व्रत “चातुर्मास” अवधि के दौरान होने पर बेहद ही शुभ और भाग्यशाली माना जाता है। बहुत सी जगहों पर इसे “पार्श्व परिवर्तिनी एकादशी” के नाम से भी जाना जाता है। यह नाम इसलिए दिया गया क्योंकि कुछ लोगों का मानना ​​है कि इसी दौरान भगवान विष्णु ने विश्राम करते हुए अपनी स्थिति को बाईं ओर से दाईं ओर स्थानांतरित कर दिया था। यही कारण है कि इस व्रत/पर्व के मौके पर देश भर में कई स्थानों पर भगवान विष्णु के अवतार भगवान वामन की पूजा की जाती है।

पार्श्व एकादशी 2021: शुभ मुहूर्त 

इस वर्ष पार्श्व एकादशी 17 सितंबर को पड़ रही है।

पार्श्व एकादशी पारण समय

06:07:10 से 08:34:22 18 सितंबर, 2021

अवधि

2 घंटा 27 मिनट मिनट

पार्श्व एकादशी का महत्व 2021

पार्श्व एकादशी का व्रत बहुत से लोग अत्यंत विश्वास और समर्पण के साथ मनाते हैं। इस व्रत के महत्व का अंदाज़ा आप इसी बात से लगा लीजिये कि, इस व्रत को  सदियों से मनाया जा रहा है। ऐसा माना जाता है कि पार्श्व एकादशी का व्रत करने से लोगों को धन, अच्छे स्वास्थ्य और सुख की प्राप्ति होती है।

बहुत से लोगों का इस व्रत के बारे में यह भी मानना ​​है कि यह व्रत जब समर्पण और पूरी श्रद्धा के साथ किया जाता है, तो यह व्रती को अतीत के पापों से मुक्त कर सकता है और व्यक्ति को उसके कर्म चक्र से मुक्त कर सकता है, अर्थात मोक्ष प्रदान करता है। यह व्रत व्यक्तियों को उच्च आध्यात्मिकता प्राप्त करने में भी मदद करता है और व्यक्तियों की इच्छा शक्ति को मजबूत भी बनाता है।

पार्श्व एकादशी 2021: व्रत विधि 

  • पार्श्व एकादशी के इस पावन मौके पर बहुत से लोग व्रत करते हैं, इस व्रत को पार्श्व एकादशी व्रत के नाम से जाना जाता है।
  • इस दिन का उपवास पूरे दिन किया जाता है।
  • एकादशी के दिन सूर्योदय से यह व्रत प्रारंभ होता है और अगले दिन यानी द्वादशी पर समाप्त होता है।
  • इस दिन व्रत रखने वाले लोग दिन में एक समय भोजन कर सकते हैं। हालाँकि आपको सूर्योदय से पहले ही खाना खा लेने की सलाह दी जाती है।
  • पार्श्व एकादशी का व्रत तभी पूरा माना जाता है जब व्रती भगवान विष्णु की पूजा करें और जरूरतमंदों और ब्राह्मणों को दान दे।
  • पार्श्व एकादशी की पूर्व संध्या पर सभी को चावल, बीन्स और अनाज पकाने और खाने से मना किया जाता है।
  • व्रत रखने वाले भक्तों को मंत्रों का पाठ करना चाहिए और देवता को प्रसन्न करने के लिए इस दिन भजन गाना चाहिए।

पार्श्व एकादशी व्रत कथा

पार्श्व एकादशी व्रत की कथा राक्षस महाबली और भगवान विष्णु के वामन अवतार से जुड़ी है। पौराणिक कथा के अनुसार, दुष्ट राजा बाली, त्रेतायुग काल में रहते थे। उसने अपने राज्य पर शासन करने के लिए धर्म का पालन किया और उदार और दानशील था, लेकिन फिर भी, वह स्वभाव से बेहद ही क्रूर था। वह पराक्रमी था, और उसने दुनिया पर अपनी जीत का परचम फहरा लिया था।

एक दिन उन्होंने अश्वमेध यज्ञ करने का निश्चय किया और इसके लिए सभी आवश्यक व्यवस्था भी की। स्वर्ग पर भी अपना अधिपत्य बनाने और इंद्रा से राजगद्दी छीनने के लिए बाली का फैसला देखकर इंद्रा देवता चिंतित हो उठे इसलिए उन्होंने मदद के लिए भगवान विष्णु को बुलाया।

बताया जाता है तब भगवान विष्णु ने वामन के रूप में अवतार लिया और बाली को हराया। भगवान विष्णु ने अपने पांचवें मुख्य अवतार वामन का अवतार लिया, जो एक बौने ब्राह्मण लड़के का था। इसके बाद वह बाली के दरबार में गए और उन्होंने उनसे पूछा कि, क्या वह उसे वामन के पैर से तीन गुना आकार की भूमि दे सकते हैं? बाली यह सोचकर सहमत हो गया कि एक छोटे लड़के के पैर छोटे होंगे। बाली के गुरु शुराचार्य समझ गए थे कि लड़का कोई साधारण व्यक्ति नहीं बल्कि भगवान विष्णु थे। उसने बाली को चेतावनी दी, लेकिन उसने अपनी बात वापस लेने से इनकार कर दिया।

पहले चरण से भगवान विष्णु ने पृथ्वी को ढँक दिया। दूसरे चरण से उसने आकाश को ढँक लिया। इससे बाली को समझ में आया कि ब्राह्मण लड़का भगवान विष्णु था। उसने अपनी हार स्वीकार कर ली और अपना सिर भगवान विष्णु को अर्पित कर दिया। वामन ने अपना अंतिम चरण बाली के सिर पर रखा। उन्हें पाताल लोक भेजा गया।

इसलिए इस दिन व्रत रखने वाले भक्त वामन की पूजा करते हैं और इस कथा का पाठ करते हैं।

 

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