पुराने समय में दैत्यराज बलि ने विष्णु जी से पाताल लोक में रहने का वर मांगा था। विष्णु जी बलि से प्रसन्न थे और वे उसके साथ पाताल में रहने चले गए। महालक्ष्मी ने दैत्यराज बलि को रक्षासूत्र बांधकर भाई बनाया था। इसके बाद बलि ने विष्णु जी को पाताल लोक से आजाद कर दिया और वे लक्ष्मी जी के साथ अपने वैकुंठ धाम लौट आए।
सावन पूर्णिमा पर चंद्र-गुरु बनाएंगे गजकेसरी योग, सुबह 5.38 पर खत्म हो जाएगी भद्रा

राखी बांधने का मुहूर्त
राखी बांधने का मुहूर्त :
06:14:56 से 17:33:39 तक
अवधि :
11 घंटे 18 मिनट
रक्षा बंधन अपराह्न मुहूर्त :
13:41:54 से 16:17:59 तक

रविवार, 22 अगस्त को रक्षाबंधन मनाया जाएगा। सामान्यत: ये पर्व श्रवण नक्षत्र में मनता है, लेकिन इस बार राखी पर धनिष्ठा नक्षत्र रहेगा। गुरु कुंभ राशि में वक्री है और इसके साथ चंद्र भी रहेगा। इन ग्रहों की वजह से गजकेसरी योग बन रहा है।

माचलपुर के ज्योतिषाचार्य आचार्य श्री ओमप्रकाश त्रिवेदी के मुताबिक इस साल रक्षाबंधन पर सूर्य, मंगल और बुध सिंह राशि में रहेंगे। सिंह राशि का स्वामी सूर्य ही है। इस राशि में उसका मित्र मंगल भी रहेगा है। इस दिन शुक्र कन्या राशि में रहेगा। ग्रहों के ये योग शुभ फल देने वाले हैं। ऐसा योग 2021 से 474 साल पहले बना था। 11 अगस्त 1547 को धनिष्ठा नक्षत्र में रक्षाबंधन मनाया गया था और सूर्य, मंगल, बुध की ऐसी ही स्थिति थी। उस समय शुक्र बुध की मिथुन राशि में था, जबकि इस साल शुक्र बुध ग्रह की ही कन्या राशि में स्थित है।

इस साल नहीं रहेगी भद्रा

इस बार रक्षाबंधन पर भद्रा है ही नहीं। 22 अगस्त की सुबह 5.38 बजे भद्रा खत्म हो जाएगी। इस वजह से दिनभर रक्षाबंधन मनाया जा सकेगा। रक्षाबंधन पर पंचक रहेगा, लेकिन इस त्योहार पर पंचक होना अशुभ नहीं माना जाता है।

रक्षाबंधन पर रक्षासूत्र बांधने की है परंपरा

नकारात्मकता और दुर्भाग्य से रक्षा लिए रक्षासूत्र बांधा जाता है। रक्षासूत्र पहनने वाले व्यक्ति विचार सकारात्मक होते हैं और मन शांत रहता है। ऐसी मान्यता है। यह रक्षासूत्र बहन अपने भाई की कलाई पर बांधती है। इस दिन गुरु अपने शिष्य को, पत्नि अपने पति को भी रक्षासूत्र बांध सकती है।

राखी पूर्णिमा की पूजा-विधि

रक्षा बंधन के दिन बहने भाईयों की कलाई पर रक्षा-सूत्र या राखी बांधती हैं। साथ ही वे भाईयों की दीर्घायु, समृद्धि व ख़ुशी आदि की कामना करती हैं।

रक्षा-सूत्र या राखी बांधते हुए निम्न मंत्र पढ़ा जाता है, जिसे पढ़कर पुरोहित भी यजमानों को रक्षा-सूत्र बांध सकते हैं–

ॐ येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः।
तेन त्वामपि बध्नामि रक्षे मा चल मा चल।।

इस मंत्र के पीछे भी एक महत्वपूर्ण कथा है, जिसे प्रायः रक्षाबंधन की पूजा के समय पढ़ा जाता है। एक बार धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से ऐसी कथा को सुनने की इच्छा प्रकट की, जिससे सभी कष्टों से मुक्ति मिल जाती हो। इसके उत्तर में श्री कृष्ण ने उन्हें यह कथा सुनायी–

प्राचीन काल में देवों और असुरों के बीच लगातार 12 वर्षों तक संग्राम हुआ। ऐसा मालूम हो रहा था कि युद्ध में असुरों की विजय होने को है। दानवों के राजा ने तीनों लोकों पर कब्ज़ा कर स्वयं को त्रिलोक का स्वामी घोषित कर लिया था। दैत्यों के सताए देवराज इन्द्र गुरु बृहस्पति की शरण में पहुँचे और रक्षा के लिए प्रार्थना की। श्रावण पूर्णिमा को प्रातःकाल रक्षा-विधान पूर्ण किया गया।

इस विधान में गुरु बृहस्पति ने ऊपर उल्लिखित मंत्र का पाठ किया; साथ ही इन्द्र और उनकी पत्नी ने भी पीछे-पीछे इस मंत्र को दोहराया। इंद्र की पत्नी इंद्राणी ने सभी ब्राह्मणों से रक्षा-सूत्र में शक्ति का संचार कराया और इन्द्र के दाहिने हाथ की कलाई पर उसे बांध दिया। इस सूत्र से प्राप्त बल के माध्यम से इन्द्र ने असुरों को हरा दिया और खोया हुआ शासन पुनः प्राप्त किया।

रक्षा बंधन को मनाने की एक अन्य विधि भी प्रचलित है। महिलाएँ सुबह पूजा के लिए तैयार होकर घर की दीवारों पर स्वर्ण टांग देती हैं। उसके बाद वे उसकी पूजा सेवईं, खीर और मिठाईयों से करती हैं। फिर वे सोने पर राखी का धागा बांधती हैं। जो महिलाएँ नाग पंचमी पर गेंहूँ की बालियाँ लगाती हैं, वे पूजा के लिए उस पौधे को रखती हैं। अपने भाईयों की कलाई पर राखी बांधने के बाद वे इन बालियों को भाईयों के कानों पर रखती हैं।

कुछ लोग इस पर्व से एक दिन पहले उपवास करते हैं। फिर रक्षाबंधन वाले दिन, वे शास्त्रीय विधि-विधान से राखी बांधते हैं। साथ ही वे पितृ-तर्पण और ऋषि-पूजन या ऋषि तर्पण भी करते हैं।

कुछ क्षेत्रों में लोग इस दिन श्रवण पूजन भी करते हैं। वहाँ यह त्यौहार मातृ-पितृ भक्त श्रवण कुमार की याद में मनाया जाता है, जो भूल से राजा दशरथ के हाथों मारे गए थे।

इस दिन भाई अपनी बहनों तरह-तरह के उपहार भी देते हैं। यदि सगी बहन न हो, तो चचेरी-ममेरी बहन या जिसे भी आप बहन की तरह मानते हैं, उसके साथ यह पर्व मनाया जा सकता है।

रक्षाबंधन से जुड़ी कथाएँ
राखी के पर्व से जुड़ी कुछ कथाएँ हम ऊपर बता चुके हैं। अब हम आपको कुछ अन्य ऐसी पौराणिक घटनाएँ बताते हैं, जो इस त्यौहार के साथ जुड़ी हुई हैं–

• मान्यताओं के अनुसार इस दिन द्रौपदी ने भगवान कृष्ण के हाथ पर चोट लगने के बाद अपनी साड़ी से कुछ कपड़ा फाड़कर बांधा था। द्रौपदी की इस उदारता के लिए श्री कृष्ण ने उन्हें वचन दिया था कि वे द्रौपदी की हमेशा रक्षा करेंगे। इसीलिए दुःशासन द्वारा चीरहरण की कोशिश के समय भगवान कृष्ण ने आकर द्रौपदी की रक्षा की थी।

• एक अन्य ऐतिहासिक जनश्रुति के अनुसार मदद हासिल करने के लिए चित्तौड़ की रानी कर्णावती ने मुग़ल सम्राट हुमाँयू को राखी भेजी थी। हुमाँयू ने राखी का सम्मान किया और अपनी बहन की रक्षा गुजरात के सम्राट से की थी।

• ऐसा भी कहा जाता है कि इस दिन देवी लक्ष्मी ने सम्राट बाली की कलाई पर राखी बांधी थी।



जानिए सभी 12 चंद्र राशियों पर कैसा रहेगा इन ग्रह योगों का असर

मेष– आय में वृद्धि एवं कार्य में सफलता प्राप्त होगी। सहयोग मिलेगा।

वृषभ– कार्य की अधिकता होगी। नए काम प्राप्त होंगे। माता-पिता से सहयोग मिलेगा।

मिथुन– मंगलवार की दोपहर तक भाग्य का साथ रहेगा। अड़चनें समाप्त होंगी। यात्राएं सुखद होंगी।

कर्क– मंगलवार की दोपहर तक बेकार के कार्यों में समय व्यय होगा। आय कम रहेगी।

सिंह– राशि स्वामी सूर्य शक्ति प्रदान कर रहा है। विरोधी दबे रहेंगे। संतान खुशी देगी और विवादों में जीत मिलेगी।

कन्या– समय अच्छा रहेगा। अच्छी आय के साथ सम्मान भी मिलेगा। विरोधी शांत रहेंगे।

तुला– भाग्य का साथ मिलेगा। संतान से सुख प्राप्त होगा। आय अच्छी रहेगी। कार्य की अधिकता भी होगी।

वृश्चिक– काम ज्यादा रहेगा। जल्दबाजी से नुकसान होने की संभावनाएं हैं। बेकार के कार्यों में समय भी बर्बाद होगा।

धनु– जिम्मेदारियां ठीक से निभा पाएंगे। भाइयों से सहयोग मिलेगी। भाग्य का साथ रहेगा और आय भी अच्छी रहेगी।

मकर– पुरानी आर्थिक समस्याएं दूर होंगी। स्थाई धन-संपत्ति में वृद्धि का योग बनेगा। बड़े काम बनने के आसार हैं।

कुंभ– गुरु का गोचर अच्छी आय प्रदान करेगा। कार्य में सफलता मिलेगी। सरकारी कार्यों से धन लाभ हो सकता है।

मीन– समय सामान्य रहेगा। सोची हुई योजना सफल नहीं होगी। आय में भी रुकावट रहेगी।

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