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January 27, 2023 18:55
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संध्या की आत्माहुति   

 
 
     ब्रह्माजी कहते हें-नारद! जब भगवान शिव देवी संध्या को वरदान देकर वह से अंतर्धान हो गए, तब संध्या उस स्थान पर गई, जहा पर मुनि मेधातिथि यज्ञ कर रहे थे | उन्होंने अपने ह्रदय में तेजस्वी ब्रह्मचारी वशिष्ठ जी का स्मरण किया तथा उन्ही को प्रतिरूप में पाने की इच्छा लेकर संध्या महायज्ञ की प्रज्वलित अग्नि में कूद गई | अग्नि में उसका शरीर जलकर सूर्य मंडल में प्रवेश कर गया | तब सूर्य ने पितरो और देवताओ की तृप्ति के लिए उसे दो भागो में बांटकर रथ में स्थापित कर दिया | उसके शरीर का उपरी भाग प्रातः संध्या हुआ और शेष भाग सायं संध्या हुआ | सायं संध्या से पितरो को संतुष्टि मिलती हैं | सूर्योदय से पूर्व जब आकाश में लाली छाई होती हैं अर्थात अरुणोदय होता हैं उस समय देवताओ का पूजन करे | जिस समय लाल कमल के समान सूर्य असत होता हैं अर्थात डूबता हैं उस समय पितरो का पूजन करना चाहिए | भगवान शिव ने संध्या के प्राणों को दिव्य शरीर प्रदान कर दिया | जब मेधातिथि मुनि का यज्ञ समाप्त हुआ, तब उन्होंने एक कन्या को, जिसकी कांति सोने के समान थी, अग्नि में पड़े देखा | उसे मुनि ने भली प्रकार स्नान कराया और अपनी गोद में बैठा लिया | उन्होंने उसका नाम ‘अरुंधती’ रखा | यज्ञ के निर्विघ्न समाप्त होने और पुत्री प्राप्त होने के कारण मेधातिथि मुनि बहुत प्रसन्न थे | उन्होंने अरुंधती का पालन आश्रम में ही किया | वह धीरे-धीरे उसी चंद्रभागा नदी के तट पर रहते हुए बड़ी होने लगी | जब वह विवाह योग्य हुई तो हम त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु और महेश ने मेधा मुनि से बात कर, उसका विवाह मुनि वशिष्ठ से करा दिया | 
 
     मुने! मेधातिथि की पुत्री महासाध्वी अरुंधती अति पतिव्रता थी | वह मुनि वशिष्ठ को पति रूप में पाकर बहुत प्रसन्न थी | वह उनके साथ रमण करने लगी | उससे शक्ति आदि शुभ एवं श्रेष्ठ पुत्र उत्पन्न हुए | हें नारद! इस प्रकार मैंने तुम्हे परम पवित्र देवी संध्या का चरित्र सुनाया हैं | यह समस्त अभीष्ट फ्लो को देने वाला हैं | यह परम पावन और दिव्य हैं | जो स्त्री-पुरुष इस शुभ व्रत का पालन करते हैं, उनकी सभी कामनाए पूरी होती हैं |
 
 
|| शिवपुराण ||
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