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January 28, 2023 14:49
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शिव पूजन की विधि तथा फल प्राप्ति 

 

ऋषि बोले-  हें सूत जी! अब आप हम पर कृपा कर हमें ब्रह्माजी व नारद के संवादों के अनुसार शिव पूजन की विधि बताइए, जिससे भगवान शिव प्रसन्न होते हैं | ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र आदि चरों वर्णों को शिव पूजन किस प्रकार करना चाहिए ? आपने व्यास जी के मुख से जो सुना हो, कृपया हमें भी बताइए | महर्षियों के ये वचन सुनकर सूत जी ने ऋषियों द्वारा पूछे गए प्रश्नों का उत्तर देते हुए 
कहना आरम्भ किया |

 सूत जी बोले-  हें मुनिश्वर! जैसा आपने पूछा है, वह बड़े रहस्य की बात है | मैंने उसे जैसा  सुना है, उसे मै अपनी बुद्धि के अनुसार आपको सुना रहा हूँ | पूर्वकाल में व्यास जी ने  सनत्कुमार जी से यही प्रश्न किया था | फिर उपमन्यु जी ने भी इसे सुना था और इसे भगवान  श्रीकृष्ण को सुनाया था | वही सब मै अब ब्रह्मा-नारद संवाद के रूप में आपको बता रहा हूँ |

     ब्रह्माजी ने कहा-  भगवान शिव की भक्ति सुखमय, निर्मल एवं सनातन रूप है त्तथा समस्त  मनोवांछित फलों को देने वाली है | यह दरिद्रता, रोग, दुख तथा शत्रु द्वारा दी गई पीड़ा  का नाश करने वाली है | जब तक मनुष्य भगवान शिव का पूजन नहीं करता और उनकी  शरण में नही जाता, तब तक ही उसे दरिद्रता, दुख, रोग और शत्रुजनित पीड़ा, ये चरों प्रकार के पाप दुखी करते हैं | भगवान शिव की पूजा करते ही ये दुख समाप्त हो जाते है और अक्षय  सुखों की प्राप्ति होती है | वह सब भोगों को प्राप्त कर अंत में मोक्ष प्राप्त करता है | शिवजी  का पूजन करने वालों को धन, संतान और सुख की प्राप्ति होती है | ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रों को सभी कामनाओ तथा प्रयोजनों की सिद्धि के लिए विधि अनुसार पूजा-उपासना करनी चाहिए | ब्रह्ममुहूर्त में उठकर गुरु तथा शिव का स्मरण करके तीर्थों का चिंतन एवं भगवान विष्णु  का ध्यान करे | फिर मेरा स्मरण-चिंतन करके स्तोत्र पाठ पूर्वक शंकरजी का विधिपूर्वक नाम  लें | तत्पश्चात उठकर शौचक्रिया करने के लिए दक्षिण दिशा में जाएं तथा मल-मूत्र त्याग करें |
ब्राह्मण गुदा की शुद्धि के लिए उसमे पांच बार शुद्ध मिट्टी का लेप करें और धोएं | क्षत्रिय चार बार, वैश्य तीन बार और शूद्र दो बार यही क्रम करे |

तत्पश्चात बाएं हाथ में दस बार और  दोनों हाथों में सात बार मिट्टी लगाकर धोएं | प्रत्येक पैर तीन-तीन बार मिट्टी लगाएं |
स्त्रियों को भी इसी प्रकार क्रम करते हुए शुद्ध मिट्टी से हाथ-पैर धोने चाहिए | ब्राह्मण को बारह अंगुल, क्षत्रिय को ग्यारह, वैश्य को दस और शूद्र को नौ अंगुल की दातुन करनी  चाहिए | षष्ठी, अमावस्या, नवमी, व्रत के दिन, सूर्यास्त के समय, रविवार और श्राद्ध के दिन दातुन न करे | दातुन के पश्चात जलाशय में जाकर स्नान करे तथा विशेष देश-काल आने पर मंत्रोच्चापूर्वक स्नान करें | फिर एकांत स्थान पर बैठकर विधिपूर्वक संध्या करें तथा इसके  उपरांत विधि-विधान से शिवपूजन का कार्य आरम्भ करें | तदुपरांत मन को सुस्थिर करके  पूजा ग्रह में प्रवेश करें तथा आसन पर बैठें |
       

सर्वप्रथम गणेश जी का पूजन करें | उसके उपरांत शिवजी की स्थापना करें | तीन बार आचमन कर तीन प्राणायाम करते समय त्रिनेत्रधारी शिव का ध्यान करें | महादेव जी के पांच मुख, दस भुजाएं और जिनकी स्फटिक के समान उज्ज्वल कांति हैं | सब प्रकार के आभूषण  उनके श्रीअंगों को विभूषित करते हैं तथा वे बाघम्बर बांधे हुए हैं | फिर प्रणव-मन्त्र अर्थात ओंकार से शिवजी की पूजा आरम्भ करें | पाद्य, अर्घ्य और आचमन के लिए पत्रों को तैयार करें | नौ कलश स्थापित करें तथा उन्हें कुशाओं से ढककर रखें | कुशाओं से जल लेकर ही सबका प्रक्षालन करें | तत्पश्चात सभी कलशों में शीतल जल डालें | खस और चन्दन को  पाद्यपात्र में रखें | चमेली के फूल, शीतल चीनी, कपूर, बड की जड तथा तमाल का चूर्ण बना ले और आचमनीय के पात्र में डालें | इलायची और चन्दन को तो सभी पत्रों में डालें | देवाधिदेव महादेव जी के सामने नन्दीश्वर का पूजन करें | गंध, धुप तथा दीपों द्वारा भगवान  शिव की आराधना आरम्भ करें |

       ‘संद्योजातं प्रपद्यामि‘ मंत्र से शिवजी का आवाहन करें | ‘ॐ वामदेवाय नमः‘ मंत्र द्वारा  भगवान महेश्वर को आसन पर स्थापित करें | फिर ‘ईशानः सर्वविद्यानाम‘ मंत्र से आराध्य देव  का पूजन करें | पाद्य और आचमनीय अर्पित कर अर्घ्य दे | तत्पश्चात गंध और चन्दन मिले हुए जल से भगवान शिव को विधिपूर्वक स्नान कराएं | तत्पश्चात पंचामृत से भगवान शिव को स्नान कराएं | पंचामृत के पंचों तत्वों-दूध, दही, शहद, गन्ने का रस तथा घी से नहलाकर महादेव जी के प्रणव मंत्र को बोलते हुए उनका अभिषेक करें | जलपात्रों में शद्ध व शीतल जल लें | सर्वप्रथम महादेव जी के लिंग पर कुश, अपामार्ग, कपूर, चमेली, चम्पा, गुलाब, सफ़ेदकनेर, बेला, कमल और उत्पल पुष्पों एवं चन्दन को चढाकर पूजा करें | उन पर अनवरत जल की धारा गिरने की भी व्यवस्था करें | जल से भरे पत्रों से महेश्वर को नहलाएं | मंत्रो से भी पूजा करनी चाहिए | ऐसी पूजा समस्त अभीष्ट फलों को देने वाली है |

       पवमान मंत्र, रूद्र मंत्र, नीलरूद्र मंत्र, पुरुष सूक्त, अथर्वशीर्ष मंत्र, शांति मंत्र,  भारुण्ड मंत्र, स्थंतरसाम, मृत्युंजय मंत्र एवं पंचाक्षर मंत्रों से पूजन करें | शिवलिंग पर एक  सहस्र या एक सौ जलधाराएं गिराने की व्यवस्था करें | स्फटिक के समान निर्मल, अविनाशी, सर्वलोकमय परमदेव, जो आरम्भ और अंत से हीन तथा रोगियों के औषधि के समान है, जिन्हें शिव के नाम से पहचाना जाता है एवं जो शिवलिंग के रूप में विख्यात है, उन भगवान  शिव के मस्तक पर धूप, दीप, नैवेद्य और ताम्बूल आदि मंत्रों द्वारा अर्पित करें | अर्घ्य देकर  भगवान शिव के चरणों में फूल अर्पित करें | फिर महेश्वर को प्रणाम कर आत्मा से शिवजी  की आराधना करें और प्रार्थना करते समय हाथ में फूल लें | भगवान शिव से क्षमायाचना  करते हुए कहें-हें कल्याणकारी शिव! मैंने अनजाने में अथवा जानबूझकर जो जप-तप  पूजा आदि सत्कर्म किए हो, आपकी कृपा से वे सफल हों | हर्षित मन से शिवजी को फूल अर्पित करें | स्वस्ति वचन कर, अनेक आशीर्वाद ग्रहण करें | भगवान शिव से प्रार्थना करें कि ‘प्रत्येक जन्म में मेरी शिव में भक्ति हो तथा शिव ही मेरे शरणदाता हो |’ इस प्रकार परम  भक्ति से उनका पूजन करें | फिर सपरिवार भगवान को नमस्कार करें | जो मनुष्य भक्तिपूर्वक प्रतिदिन भगवान शिव की पूजा करता है, उसे सब सिद्धियां प्राप्त  होती है | उसे मनोवांछित फलों की प्राप्ति होती है | उसके सभी रोग, दर्द और कष्ट  समाप्त हो जाते है | भगवान शिव की कृपा से उपासक का कल्याण होता है | भगवान शंकर  की पूजा से मनुष्य में सद्गुणों की वृद्धि होती है |  यह सब जानकर नारद अत्यंत प्रसन्न होते हुए अपने पिता ब्रह्माजी को धन्यवाद देते हुए  बोले कि आपने मुझ पर कृपा कर मुझे शिव पूजन की अमृत विधि बताई है | शिव भक्ति समस्त भोग और मोक्ष प्रदान करने वाली है |

 

|| शिव पुराण ||

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