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January 27, 2023 17:54
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दक्ष का भगवान शिव को शाप देना 

 
 
ब्रह्माजी बोले-हे नारद! पूर्वकाल में समस्त महात्मा और ऋषि प्रयाग में इकठ्ठा हर | वहां पर उन्होंने एक बहुत विशाल यज्ञ का आयोजन किया था | उस यज्ञ में देवर्षि, देवता, ऋषि-मुनि, साधु-संत, सिद्धगण तथा ब्रह्म का साक्षात्कार करने वाले महान ज्ञानी पधारे | जिसमे मैं स्वयं अपने महातेजस्वी निगमों-आगमों सहित परिवार को लेकर वहां पहुंचा | वहां बहुत बड़ा उत्सव हो रहा था | अनेक शास्त्रों में ज्ञान की चर्चा एवं वाद-विवाद हो रहा था | उस यज्ञ में त्रिलोकीनाथ भगवान शिव भी देवी सती और अपने गणों सहित पधारे थे | भगवान शिव को वहां आया देख मैंने, सभी देवताओं, ऋषियों-मुनियों ने उन्हें झुककर, भक्तिभाव से प्रणाम किया तथा अनेक प्रकार से उनकी स्तुति की | शिवजी की आज्ञा पाकर सभी ने अपना आसन ग्रहण कर लिया | इसी समय प्रजापति दक्ष भी वहां आ पहुंचे | वे बड़े ही तेजस्वी थे | प्रजापति दक्ष ने मुझे प्रणाम करके अपना आसन ग्रहण कर लिया | वे ब्रह्माण्ड के अधिपति थे | इसी कारण उन्हें अपने पद का घमण्ड हो गया था | उनके मन में अहंकार ने घर कर लिया था | ब्रह्माण्ड के अधिपति होने के कारण वे सभी देवताओं के वंदनीय थे | सभी ऋषि-मुनियों सहित देवर्षियों ने भी मस्तक झुकाकर प्रजापति दक्ष को प्रणाम किया और उनकी स्तुति कर उनका आदर-सत्कार किया | परन्तु त्रिलोकीनाथ भगवान शिव शम्भु ने न तो उन्हें प्रणाम किया और न ही अपने आसन से उठकर दक्ष का स्वागत किया | इस बात पर दक्ष क्रोधित हो गए | ज्ञानशून्य होने के कारण प्रजापति दक्ष ने क्रोधित नेत्रों से महादेव जी को देखा और सबको सुनाते हुए उच्च स्वर में कहने लगे | 
 
     प्रजापति दक्ष बोले-सभी देवता, असुर, ब्राह्मण, ऋषि-मुनि सभी मुझे नम्रतापूर्वक प्रणाम कर मेरे आगे सर झुकाते हैं | ये सभी उत्तम भक्ति भाव से मेरी आराधना करते हैं परन्तु सदैव प्रेतों और पिशाचों से घिरा रहने वाला यह दुष्ट मनुष्य क्यों मुझे देखकर अनदेखा कर रहा हैं ? श्मशान में निवास करने वाला यह निर्लज्ज जीव क्यों मेरे सामने मस्तक नहीं झुकता ? भूतों-पिशाचों का साथ करने के कारण क्या यह शास्त्रों की विधि भी भूल गया हैं | इसने नीति के मार्ग को भी कलंकित किया हैं | इसके साथ रहने वाले या इसकी बातों का अनुसरण करने वाले मनुष्य पख्नादी, दुष्ट और पापा का आचरण करने वाले होते हैं | वे ब्राह्मणों की बुराई करते हैं तथा स्त्रियों के प्रति आकर्षित होते हैं | यह रूद्र चारों वर्णों से पृथक और कुरूप हैं | इसलिए इस पावन यज्ञ से इसे बहिष्कृत कर दिया जाए | यह उत्तम कुल और जन्म से हीन हैं | अत: इसे यज्ञ में भाग न लेने दिया जाए | 
 
     पुत्र! क्रोध से विवेक समाप्त हो जाता हैं | दक्ष ने शिव के लिए अपशब्द कहते समय उसके परिणाम पर तनिक भी विचार नहीं किया | अहंकार के कारण वह शिव के स्वरूप को भूल गया | वह यह भी भूल गया कि आदिशक्ति ने जिसका तप द्वारा वरण किया हैं, वह कोई साधारण मनुष्य, ऋषि या देव नहीं हैं | 
 
     ब्रह्माजी बोले-हे नारद! दक्ष की ये बातें सुनकर भृगु आदि बहुत से महर्षि रुद्रदेव को दुष्ट मानकर उनकी निंदा करने लगे | ये बातें सुनकर नंदी को बुरा लगा | उनका क्रोध बढ़ने लगा और वे दक्ष को शाप देते हुए बोले कि हे महामुढ़! दुष्टबुद्धि दक्ष! तू मेरे स्वामी देवाधिदेव महेश्वर को यज्ञ से निकलने वाला कौन होता हैं ? जिनके स्मरण मात्र से यज्ञ सफल हो जाते हैं और तीर्थ पवित्र हो जाते हैं तू उन महादेव जी को कैसे शाप दे सकता हैं ? मेरे स्वामी निर्दोष हैं और तूने अपने स्वार्थ की सिद्धि के लिए उन्हें शाप दिया हैं और उनका मजाक उड़ाया हैं | जिन सदाशिव ने इस जगत की सृष्टि की, इसका पालन किया और जो इसका संहार करते हैं, तू उन्हीं महेश्वर को शाप देता हैं |
 
     नंदी के ऐसे वचनों को सुनकर प्रजापति दक्ष के क्रोध की कोई सीमा न रही | वे आग-बबूला हो गए और नंदी समेत सभी रूद्रगणों को शाप देते हुए बोले-अरे दुष्ट रूद्रगणों | मैं तुम्हे शाप देता हूँ कि तुम सब वेदों से बहिष्कृत हो जाओ | तुम वैदिक मार्ग से भटक जाओ और सभी ज्ञानी मनुष्य तुम्हारा त्याग कर दे | तुम शिष्ट आचरण न करो और पाखंडी हो जाओ | सर पर जटा, शरीर पर भस्म एवं हड्डियों के आभूषण धारण कर मद्यपान (शराब का सेवन) करो | जब दक्ष ने शिवजी के प्रिय पार्षदों को इस प्रकार शाप दे दिया तो नंदी बहुत क्रुद्ध हो गए | नंदी भगवान शिव के प्रिय पार्षद हैं | वे बड़े गर्व से दक्ष को उत्तर देते हुए बोले | 
 
     नन्दीश्वर ने कहा-हे दुर्बुद्धि दक्ष! तुझे शिव तत्व का ज्ञान नहीं हैं | तूने अहंकार में शिवगणों को शाप दे दिया हैं | तेरे कहने पर भृगु आदि ब्राह्मणों ने भी अभिमान के कारण भगवान शिव का मजाक उड़ाया हैं | अत: मैं भगवान शिव के तेज के प्रभाव से तुझे शाप देता हूँ कि तुझ जैसे अहंकारी मनुष्य, जो सिर्फ कर्मों के फल को देखते हैं, वेदवास में फंसकर रह जाएंगे | उनका वेड तत्वज्ञान शून्य हो जाएगा | वे सदैव मोह-माया में ही लिप्त रहेंगे | वे पुरुषार्थ विहीन होंगे और स्वर्ग को ही महत्त्व देंगे | वे क्रोधी व लोभी होंगे | वे सदा ही दान लेने में लगे रहेंगे | 
 
     हे दक्ष! जो भी भगवान शिव को सामान्य देवता समझकर उनका अंदर करेगा, वह सदैव के लिए तत्वज्ञान से विमुख हो जाएगा | वह आत्मज्ञान को भूलकर पशु के समान हो जाएगा तथा यह दक्ष, जो कि कर्मों से भ्रष्ट हो चुका हैं, इसका मुख बकरे के समान हो जाएगा | इस प्रकार बहुत गुस्से से भरे नंदी ने जब दक्ष और ब्राह्मणों को शाप दिया तो वहाँ बहुत शोर मच गया | भगवान शिव मधुर वाणी में मंदी को समझाने लगे कि वे शांत हो जाए | 
 
     प्रभु शिव बोले-नंदी! तुम तो परम ज्ञानी हो | तुम्हे क्रोध नहीं करना चाहिए | तुमने बिना कुछ जाने और समझे ही दक्ष तथा समस्त ब्राह्मण कुल को शाप दे दिया हैं | सच्चाई तो यह हैं कि मुझे कोई भी शाप छू ही नहीं सकता हैं | इसलिए तुम्हे अपने क्रोध पर नियंत्रण रखना चाहिए था | किसी की बुद्धि कितनी ही दूषित क्यों न हो, वह कभी वेदों को शाप नहीं दे सकता | नंदी! तुम तो सिद्धों को भी तत्वज्ञान का उपदेश देने वाले हो | तुम तो जानते हो कि मैं ही यज्ञ हूँ, मैं ही यज्ञकर्म हूँ | यज्ञ की आत्मा मैं हूँ, यज्ञपरायण यमराज भी मैं हूँ | फिर मैं कैसे यज्ञ से बहिष्कृत हो सकता हूँ ? तुमने व्यर्थ ही ब्राह्मणों को शाप दे दिया हैं | 
 
     ब्रह्माजी बोले-नारद! जब भगवान शिव ने अनेक प्रकार से नंदी को समझाया तो उनका क्रोध शांत हो गया | तब शिवजी अपने एनी गणों व पार्षदों के साथ अपने निवास स्थान कैलाश पर्वत पर चले गए | क्रोध से भरे दक्ष भी ब्राह्मणों के साथ अपने स्थान पर चले गए परन्तु उनके मन में महादेव जी के लिए क्रोध एवं ईर्ष्या का भाव ऐसा ही रहा | उन्होंने शिवजी के प्रति श्रद्धा को त्याग दिया और उनकी निंदा करने लगे | दिन-ब-दिन उनकी ईर्ष्या बढ़ती जा रही थी | 
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