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January 27, 2023 16:12
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गुणनिधि को कुबेर पद की प्राप्ति 

 
 
     नारद जी ने प्रश्न किया-हें ब्रह्माजी! अब आप मुझे यह बताइए कि गुणनिधि जैसे महापापी मनुष्य को भगवान शिव द्वारा कुबेर पद क्यों और कैसे प्रदान किया गया ? हें प्रभु! कृपा कर इस कथा को भी बताइए | ब्रह्माजी बोले-नारद! शिवलोक में सारे दिव्य भोगों का उपभोग तथा उमा महेश्वर का सेवन कर, वह अगले जन्म में कलिंग के राजा अरिंदम का पुत्र हुआ | उसका नाम दम था | बालक दम की भगवान शंकर में असीम भक्ति थी | वह सदैव शिवजी की सेवा में लगा रहता था | वह अन्य बालको के साथ मिलकर शिव भजन करता | युवा होने पर उसके पिता अरिंदम की मृत्यु के पश्चात दम को राजसिंहासन पर बैठाया गया | 
 
     राजा दम सब ओर शिवधर्म का प्रचार और प्रसार करने लगे | वे सभी शिवालयों में दीप दान करते थे | उनकी शिवजी में अनन्य भक्ति थी | उन्होंने अपने राज्य में रहने वाले सभी ग्रामाध्यक्षों को यह आज्ञा दी थी कि ‘शिव मंदिर’ में दीपदान करना सबके लिए अनिवार्य हैं | अपने गाव के आस-पास जितने शिवालय हैं, वहा सदा दीप जलना चाहिए | राजा दम ने आजीवन शिव धर्म का पालन किया | इस तरह वे बड़े परमात्मा कहलाए | उन्होंने शिवालयों में बहुत से दीप जलवाए | इसके फलस्वरूप वे दीपों की प्रभा के आश्रय हो मृत्योपरांत अलकापुरी के स्वामी बने |
 
     ब्रह्माजी बोले-हें नारद! भगवान शिव का पूजन व उपासना महँ फल देने वाली हैं | दीक्षित के पुत्र गुणनिधि ने, जो पूर्ण अधर्मी था, भगवान शिव की कृपा पाकर दिक्पाल का पद पा लिया | अब मैं तुम्हे उसकी भगवान शिव के साथ मित्रता के विषय में बताता हूँ | 
 
     नारद! बहुत पहले की बात हैं | मरते मानस पुत्र पुलस्त्य से विश्रवा का जन्म हुआ | और विश्रवा के पुत्र कुबेर हुए | उन्होंने पूर्वकाल में बहुत कठोर तप किया | उन्होंने विश्वकर्मा द्वारा रचित अलकापुरी का उपभोग किया | मेघवाहन कल्प के आरम्भ होने पर वे कुबेर के रूप में घोर तप करने लगे | वे भगवान शिव द्वारा प्रकाशित काशी पूरी में गए और अपने मन के रत्नमय दीपों से ग्यारह रुद्रों को उदबोधित कर वे तन्मयता से शिवजी के ध्यान में मग्न होकर निश्चल भाव से उनकी उपासना करने लगे | वहा उन्होंने शिवलिंग की प्रतिष्ठा की | उत्तम पुष्पों द्वारा शिवलिंग का पूजन किया | कुबेर पूरे मन से तप में लगे थे | उनके पूरे शरीर में केवल हड्डियों का ढांचा और चमड़ी ही बची थी | इस प्रकार उन्होंने दस हजार वर्षों तक तपस्या की | तत्पश्चात भगवान शिव अपनी दिव्य शक्ति उमा के भव्य रूप के साथ कुबेर के पास गए | अलकापति कुबेर मन को एकाग्र कर शिवलिंग के सामने तपस्या में लीन थे | भगवान शिव ने कहा-अलकापते! मैं तुम्हारी भक्ति और तपस्या से प्रसन्न हूँ | तुम मुझसे अपनी इच्छानुसार वर मांग सकते हो | यह सुनकर जैसे ही कुबेर ने आँखे खोली तो उन्हें अपने सामने भगवान नीलकंठ खड़े दिखाई दिए | उनका तेज सूर्य के सामान था | उनके मस्तक पर चन्द्रमा अपनी चांदनी बिखेर रहा था | उनके तेज से कुबेर की आँखे चौंधिया गई | तत्काल उन्होंने अपनी आँखे बंद कर ली | वे भगवान शिव से बोले-भगवन! मेरे नेत्रों को वह शक्ति दीजिए, जिससे मैं आपके चरणारविन्दों का दर्शन कर सकूं | 
 
     कुबेर की बात सुनकर भगवान शिव ने अपनी हथेली से कुबेर को स्पर्श कर देखने की शक्ति प्रदान की | दिव्य दृष्टि प्राप्त होने पर वे आँख फाड-फाडकर देवी उमा की ओर देखने लगे | वे सोचने लगे कि भगवान शिव के साथ यह सर्वांग सुन्दरी कौन हैं ? इसने ऐसा कौन सा तप किया है जो इसे भगवान शिव की कृपा से उनका सामीप्य, रूप और सौभाग्य प्राप्त हुआ हैं | वे देवी उमा को निरंतर देखते जा रहे थे | देवी को घूरने के कारण उनकी बायीं आँख फूट गई | शिवजी ने उमा से कहा-उमे! यह तुम्हारा पुत्र हैं | यह तुम्हे क्रूर दृष्टि से नहीं देख रहा हैं | यह तुम्हारे तप बल को जानने की कोशिश कर रहा हैं, फिर भगवान शिव ने कुबेर से कहा-मैं तुम्हारी तपस्या से बहुत प्रसन्न हूँ | मैं तुम्हे वर देता हूँ कि तुम समस्त निधियों और गुह्म शक्तियों के स्वामी हो जाओ | सुव्रतो, यक्षों और किन्नरों के अधिपति होकर धन के दाता बनो | मेरी तुमसे सदा मित्रता रहेगी और मैं तुम्हारे पास सदा निवास करूँगा अर्थात तुम्हारे स्थान अलकापुरी के पास ही मैं निवास करूँगा | कुबेर अब तुम अपनी माता के चरणों में प्रणाम करो | ये ही तुम्हारी माता हैं | ब्रह्माजी कहते हैं-नारद! इस प्रकार भगवान शिव ने देवी से कहा-हें देवी! यह आपके पुत्र के समान हैं | इस पर अपनी कृपा करो | ‘ यह सुनकर उमा देवी बोली-वत्स! तुम्हारी, भगवान शिव में सदैव निर्मल भक्ति बनी रहे | बायीं आँख फूट जाने पर तुम एक ही पिंगल नेत्र से युक्त रहो | महादेव जी ने जो वर तुम्हे प्रदान किए हैं, वे सुलभ हैं | मेरे रूप से ईर्ष्या के कारण तुम कुबेर नाम से प्रसिद्ध होगे | कुबेर को वर देकर भगवान शिव और देवी उमा अपने धाम को चले गए | इस प्रकार भगवान शिव और कुबेर में मित्रता हुई और वे अलकापुरी के निकट कैलाश पर्वत पर निवास करने लगे | 
 
     नारद जी ने कहा-ब्रह्माजी! आप धन्य हैं | आपने मुझ पर कृपा कर मुझे इस अमृत कथा के बारे में बताया हैं | निश्चय ही, शिव भक्ति दुखों को दूर कर समस्त सुख प्रदान करने वाली हैं |
 
|| शिवपुराण ||
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