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January 28, 2023 15:11
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सती की तपस्या 

 

     ब्रह्माजी बोले-हें नारद! एक दिन मैं तुम्हे लेकर प्रजापति दक्ष के घर पहुंचा | वहा मैंने देवी सती को उनके पिता के पास बैठे देखा | मुझे देखकर दक्ष ने आसन से उठकर मुझे नमस्कार किया | तत्पश्चात सती ने भी प्रसन्नतापूर्वक मुझे नमस्कार किया | हम दोनों वहां आसन पर बैठ गए | तब मैंने देवी सती को आशीर्वाद देते हुए कहा-सती! जो केवल तुम्हे चाहते हैं और तुम्हारी ही कामना करते हैं | तुम भी मन में उन्ही को सोचती हो और उसी के रूप का स्मरण करती हो | उन्ही सर्वज्ञ जगदीश्वर महादेव को तुम पति रूप में प्राप्त करो | वे ही तुम्हारे योग्य हैं | कुछ देर बाद दक्ष से विदा लेकर मैं अपने धाम को छल दिया | दक्ष को मेरी बातें सुनकर बड़ा संतोष एवं प्रसन्नता हुई | मेरे कथन से उनकी सारी चिंताएं दूर हो गई | धीरे-धीरे सती ने कुमारावस्था पार कर ली और वे युवा अवस्था में प्रवेश कर गई | उनका रूप अत्यंत मनोहारी था | उनका मुख दिव्य तेज से शोभायमान था | देवी सती को देखकर प्रजापति दक्ष को उनके विवाह की चिंता होंने लगी | तब पिता के मन की बात जानकर देवी सती ने महादेव को पति के रूप में पाने की इच्छा अपनी माता को बताई | उन्होंने अपनी माता से भगवान शंकर को प्रसन्न करने के लिए तपस्या करने की आज्ञा मांगी | उनकी माता ने आज्ञा देकर घर पर ही उनकी आराधना आरम्भ करा दी | 
 
     आश्विन मास में नंदा अर्थात प्रतिपदा, षष्ठी और एकादशी तिथियों में उन्होंने भक्तिपूर्वक भगवान शिव का पूजन कर उन्हें गुड, भात और नमक का भोग लगाया व नमस्कार किया | इसी प्रकार एक मास बीत गया | कार्तिक मास की चतुर्दशी को देवी सती ने मालपुओं और खीर से भगवान शिव को भोग लगाया और उमका निरंतर चिंतन करती रही | मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को वे तिल, जौ और चावल से शिवजी की आराधना करती और घी का दीपक जलाती | पुश माह की शुक्ल पक्ष सप्तमी को पूरी रात जागरण कर सुबह खिचड़ी का भोग लगाती | माघ की पूर्णिमा की रातभर वे शिव आराधना में लीन रहती और सुबह नदी में स्नान कर गीले वस्त्रों में ही पुनः पूजा करने बैठ जाती थी | फाल्गुन मास के कृष्णपक्ष की चतुर्दशी तिथि को जागरण कर शिवजी की विशेष पूजा करती थी | उनका सारा समय शिवजी को समर्पित था | वे अपने दिन-रात शिवजी के स्मरण में ही बिताती थी | चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को वे ढाक के फूलों और दवनों से भगवान शिव की पूजा करती थी | वैशाख माह में वे सिर्फ तिलों को खाती थी | वे नए जौ के भात से शिव पूजन करते थी | ज्येष्ठ माह में वे भूखी रहती और वस्त्रों तथा भटकटैया के फूलों से रुद्रदेव का पूजन करती थी | श्रावण मास से विभिन्न फूलों व फलों से वे शिव को प्रसन्न करने की कोशिश करती | वे सिर्फ जल ही ग्रहण करती थी | देवी सती हर समय भगवान शिव की आराधना में ही लीन रहती थी | इस प्रकार उन्होंने दृढतापूर्वक नंदा व्रत को पूरा किया | व्रत पूरा करने के पश्चात वे शिवजी का ध्यान करने लगी | वे निश्चित आसन में स्थित हो निरंतर शिव आराधना करती रही | 
 
     हें नारद! देवी सती की इस अनन्य भक्ति और तपस्या को अपनी आँखों से देखने मै, विष्णु तथा अन्य सभी देवी-देवता और ऋषि-मुनि वहां गए | वहां सभी ने देवी सती को भक्तिपूर्वक नमस्कार किया और उनके सामने मस्तक झुकाए | सभी देवी-देवताओं ने उनकी तपस्या को सराहा | तब सभी देवी-देवता और ऋषि-मुनि मेरे (ब्रह्मा) और विष्णु सहित कैलाश पर्वत पर पहुंचे | वहां भगवान शिव ध्यानमग्न थे | हमने उनके निकट जाकर, दोनों हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम किया तथा उनकी स्तुति आरम्भ कर दी | हमने कहा-
 
     प्रभो! आप परम शक्तिशाली हैं | आप ही सत्व, रज और तप आदि शक्तियों के स्वामी हैं | वेदत्रयी, लोकत्रयी आपका स्वरूप हैं | आप अपनी शरण में आए भक्तो की सदैव रक्षा करते हैं | आप सदैव भक्तो का उद्धार करते हैं | हें महादेव! हें महेश्वर! हम आपको नमस्कार करते हैं | आपकी महिमा जान पाना कठिन ही नहीं असंभव हैं | हम आपके सामने अपना मस्तक झुकाते हैं | 
 
     ब्रह्माजी बोले-नारद! इस प्रकार भगवान शिव-शंकर की स्तुति करके सभी देवता मस्तक झुकाकर शिवजी के सामने चुपचाप खड़ हो गए | 
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