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January 28, 2023 15:04
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पापी गुणनिधि की कथा 

 
 
     सूत जी कहते हैं-हें ऋषियों! तत्पश्चात नारद जी ने विनयपूर्वक प्रणाम किया और उनसे पूछा-भगवन! भगवान शंकर कैलाश पर कब गए और महात्मा कुबेर से उनकी मित्रता कहां और कैसे हुई? प्रभु शिवजी कैलाश पर क्या करते हैं? कृपा कर मुझे बताए | इसे सुनने के लिए मैं बहुत उत्सुक हूँ |
 
     ब्रह्माजी बोले-हें नारद! मैं तुम्हे चंद्रमौली भगवान शिव के विषय में बताता हूँ | कांपिल्य नगर में यज्ञ दत्त दीक्षित नामक एक ब्राह्मण रहते रहते थे | वे यज्ञ विद्या में बड़े पारंगत थे | उनका गुणनिधि नामक एक आठ वर्षीय पुत्र था | उसका यज्ञोपवित हो चुका था और वह भी बहुत सी विद्याएं जानता था | परन्तु वह दुराचारी और जुआरी हो गया | वह हर वक्त खेलता-कूदता रहता था तथा गाने बजाने वालों का साथी हो गया | माता के बहुत कहने पर भी वह पिता के समीप नहीं जाता था और उनकी किसी आज्ञा को नहीं मानता था | उसके पिता घर के कार्यों तथा दीक्षा आदि देने में लगे रहते थे | जब घर पर आकार अपनी पत्नी से गुणनिधि के बारे में पूछते तो वह झूठ कह देती कि वह कही स्नान करने या देवताओं का पूजन करने गया हैं | केवल एक ही पुत्र होने के कारण वह अपने पुत्र कि कमियों को छुपाती रहती थी | उन्होंने अपने पुत्र का विवाह भी करा दिया | माता नित्य अपने पुत्र को समझाती थी | वह उसे यह भी समझाती थी कि तुम्हारी बुरी आदतों के बारे में तुम्हारे पिता को पता चल गया तो वे क्रोध के आवेश में हम दोनों को मार देंगे | परन्तु गुणनिधि पर माँ के समझाने का कोई प्रभाव नहीं पड़ता था |
 
     एक दिन उसने अपने पिता की अंगूठी चुरा ली और उसे जुए में हार आया | दैवयोग से उसके पिता को अंगूठी के विषय में पता चल गया | जब उन्होंने अंगूठी जुआरी के हाथ में देखी और उससे पूछा तो जुआरी ने कहा-मैंने कोई चोरी नहीं की है | अंगूठी मुझे तुम्हारे पुत्र ने ही दी हैं | यही नहीं, बल्कि उसने और जुआरियों को भी बहुत-सारा धन घर से लाकर दिया हैं | परन्तु आश्चर्य यह हैं कि तुम जैसे पंडित भी अपने पुत्र के लक्षणों को नहीं जान पाए | यह सारी बातें सुनकर पंडित दीक्षित का सिर शर्म से झुक गया | वे सिर झुककर और अपना मुहं ढककर अपने घर की ओर चल दिए | अपनी पत्नी से उन्होंने पूछा, तेरा लाडला पुत्र कहा गया हैं ? मेरी अंगूठी जो मैंने सुबह तुम्हे दी थी, वह कहा है ? मुझे जल्दी से दो | पंडित की पत्नी ने फिर झूठ बोल दिया, मुझे स्मरण नहीं हैं कि वह कहा हैं | अब तो दीक्षित को और भी क्रोध आ गया | वे अपनी पत्नी से बोले-तू बड़ी सत्यवादिनी हैं | इसलिए जब भी गुणनिधि के बारे में पूछता हूँ, तब मुझे अपनी बातों से बहला देती हैं | यह कहकर दीक्षित जी घर के अन्य सामानों को ढूँढने लगे किन्तु उन्हें कोई वस्तु न मिली, क्योंकि वे सब वस्तुएँ गुणनिधि जुए में हार चुका था | क्रोध में आकर पंडित ने अपने पत्नी और पुत्र को घर से निकाल दिया और दूसरा विवाह कर लिया | 
 
 
|| शिवपुराण ||
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