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January 28, 2023 14:38
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शिव और सती का विवाह

 
ब्रह्माजी बोले-नारद! जब मैं कैलाश पर्वत पर भगवान शिव को प्रजापति दक्ष की स्वीकृति की सूचना देने पहुंचा तो वे उत्सुकतापूर्वक मेरी ही प्रतीक्षा कर रहे थे | तब मैंने महादेव जी से कहा-
 
     हें भगवन! दक्ष ने कहा कि वे अपनी पुत्री सती का विवाह भगवान शिव से करने को तैयार हैं क्योंकि सती का जन्म महादेव जी के लिए ही हुआ हैं | यह विवाह होने पर उन्हें सबसे अधिक प्रसन्नता होगी | उनकी पुत्री सती ने महादेव जी को पति रूप में प्राप्त करने हेतु ही उनकी घोर तपस्या की हैं | उन्हें इस बात की भी खुशी हैं कि मैं स्वयं आपकी आज्ञा से उनकी पुत्री के लिए आपका अर्थात भगवान शिव का विवाह प्रस्ताव लेकर वहां गया | उन्होंने कहा-
 
     हें पितामह! उनसे कहिये कि वे शुभ लग्न और मुहूर्त में अपनी बारात लेकर स्वयं आएं | मैं अपनी पुत्री का कन्यादान सहर्ष महादेव जी को कर दूंगा | हें भगवन! दक्ष ने मुझसे यह बात कही हैं, इसलिए आप शुभ मुहूर्त देखकर शीघ्र ही उनके घर चले और देवी सती का वरण करें | हें नारद! मेरे ऐसे वचन सुनकर शिवजी ने कहा-
 
     हें संसार सृष्टि करने वाले ब्रह्माजी! मैं तुम्हारे और नारद जी के साथ ही प्रजापति दक्ष के घर चलूँगा | इसलिए ब्रह्माजी आप नारद और अपने मानस पुत्रों का स्मरण कर उन्हें यहां बुला ले | साथ ही मेरे पार्षद भी दक्ष के घर चलेंगे |
 
     नारद! तब भगवान शिव की आज्ञा पाकर मैंने तुम्हारा और अपने अन्य मानस पुत्रों का स्मरण किया | उन तक मेरा सन्देश पहुँचते ही वे तुरंत कैलाश पर्वत पर उपस्थित हो गए | उन्होंने हर्षित मन से महादेव जी को और मुझे प्रणाम किया | तत्पश्चात शिवजी ने भगवान श्रीहरि विष्णु का स्मरण किया | भगवान विष्णु देवी लक्ष्मी के साथ अपने विमान गरुड़ पर बैठ वहां आ गए | चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि में रविवार को पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र में त्रिलोकीनाथ भगवान शिव की बारात धूमधाम से कैलाश पर्वत से निकली | उनकी बारात में मैं, देवी सरस्वती, विष्णुजी, देवी लक्ष्मी, सभी देवी-देवता, मुनि और शिवगण आनंदमग्न होकर चल रहे थे | रस्ते में खूब उत्सव हो रहा था | भगवान शिव की इच्छा से बैल, बाघ, सांप, जटा और चंद्रकला उनके आभूषण बन गए | भगवन स्वयं नंदी पर सवार होकर प्रजापति दक्ष के घर पहुंचे |
 
     द्वार पर भगवान शिव की बारात देखकर सभी हर्ष से फूले नहीं समा रहे थे | प्रजापति दक्ष ने विधिपूर्वक भगवान शिव की पूजा अर्चना की | उन्होंने सभी देवताओं का खूब आदर-सत्कार किया तथा उन्हें घर के अंदर ले गए | दक्ष ने भगवान शिव को उत्तम आसन पर बैठाया और हम सभी देवताओं और ऋषि-मुनियों को भी यथायोग्य स्थान दिया | सभी का भक्तिपूर्वक पूजन किया | तत्पश्चात दक्ष ने मुझसे प्रार्थना की कि मैं ही वैवाहिक कार्य को संपन्न कराऊ | मैंने दक्ष की प्रार्थना को स्वीकार किया और वैवाहिक कार्य करने लगा | शुभ लग्न और शुभ मुहूर्त देखकर प्रजापति दक्ष ने अपनी पुत्री सती का हाथ भगवान शिव के हाथों में सौंप दिया और विधि-विधान से पाणिग्रहण-संस्कार संपन्न कराया | उस समय वहां बहुत बड़ा उत्सव हुआ और नाच-गाना भी हुआ | सभी आनंदमग्न थे | हम सभी देवी-देवताओं ने भगवान शिव और देवी सती की बहुत स्तुति की और उन्हें भक्तिपूर्वक प्रणाम किया | भगवान शिव और सती का विवाह हो जाने पर उनके माता-पिता बहुत प्रसन्न हुए और महादेव जी को अपनी कन्या का दान कर प्रजापति दक्ष कृतार्थ हो गए | महेश्वर का विवाह होने का पूरा संसार मंगल उत्सव मनाने लगा |
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