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❣️❣️ वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ।निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ।❣️❣️ ज्योतिष: वेद चक्षु नमः शम्भवाय च मयोभवाय च नमः शंकराय च मयस्कराय च नमः शिवाय च शिव तराय च नमः।।>

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January 28, 2023 15:57
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दक्ष की साठ कन्याओं का विवाह 

 
     ब्रह्माजी बोले-हें मुनिराज! दक्ष के इस रूप को जानकर मैं उसके पास गया | मैंने उसे शांत करने का बहुत प्रयत्न किया और सांत्वना दी | मैंने उसे तुम्हारा परिचय दिया | दक्ष को मैंने यह जानकारी भी दी कि तुम भी मेरे पुत्र हो | तुम मुनियों में श्रेष्ठ एवं देवताओं के प्रिय हो | तत्पश्चात प्रजापति दक्ष ने अपनी पत्नी से साठ सुन्दर कन्याएं प्राप्त की | तब उसका धर्म आदि के साथ विवाह कर दिया | दक्ष ने अपनी दस कन्याओं का विवाह धर्म से, तेरह कन्याओं का विवाह कश्यप मुनि से और सत्ताईस कन्याओं का विवाह चंद्रमा से कर दिया | दो-दो भूतागिरस और कृशाश्व को और शेष चार कन्याओं का विवाह तार्क्ष्य के साथ कर दिया | इन सबकी संतानों से तीनो लोक भर गए | पुत्र-पुत्रियों की उत्पत्ति के पश्चात प्रजापति दक्ष ने अपनी पत्नी सहित देवी जगदम्बिका का ध्यान किया | देवी की बहुत स्तुति की | प्रजापति दक्ष की सपत्नीक स्तुति से देवी जगदम्बिका ने प्रसन्न होकर दक्ष की पत्नी के गर्भ से जन्म लेने का निश्चय किया | उत्तम मुहूर्त देखकर दक्ष पत्नी ने गर्भ धारण किया | उस उनकी शोभा बढ़ गई | 
 
     भगवती के निवास के प्रभाव से दक्ष पत्नी महामंगल रूपिणी हो गई | देवी को गर्भ में जानकर सभी देवी-देवताओं ने जगदम्बा की स्तुति की | नौ महीने बीत जाने पर शुभ मुहूर्त में देवी भगवती का जन्म हुआ | उनका मुख दिव्य आभा से सुशोभित था | उनके जन्म के समय आकाश से फूलों की वर्षा होने लगी और मेघ जल बरसाने लगे | देवता आकाश में खड़े मांगलिक ध्वनि करने लगे | यज्ञ की बुझी हुई अग्नि पुनः जलने लगी | साक्षात जगदंबा को प्रकट हुए देखकर दक्ष ने भक्ति भाव से उनकी स्तुति की | 
 
     स्तुति सुनकर देवी प्रसन्न होकर बोली-हें प्रजापते! तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न होकर मैंने तुम्हारे घर में पुत्री के रूप में जन्म लेने का जो वर दिया था, वह आज पूर्ण हो गया हैं | यह कहकर उन्होंने पुनः शिशु रूप धारण कर लिया तथा रोने लगी | उनका रोना सुनकर दासियां उन्हें चुप कराने हेतु वहां एकत्र हो गई | जन्मोत्सव में गीत और अनेक वाद्य यंत्र बजने लगे | दक्ष ने वैदिक रीति से अनुष्ठान किया और ब्राह्मणों को दान दिया | उन्होंने अपनी पुत्री का नाम ‘उमा’ रखा | देवी उमा का पालन बहुत अच्छे तरीके से किया जा रहा था | वह बालकपन में बहुत सी लीलाएं करती थी | देवी उमा इस प्रकार बढ़ने लगी जैसे शुक्ल पक्ष में चंद्रमा की कला बढती हैं | जब भी वे अपनी सखियों के साथ बैठती, वे भगवान शिव की मूर्ति को ही चित्रित करती थी | वे सदा प्रभु शिव के भजन गाती थी | उन्ही का स्मरण करती और भगवान शिव की भक्ति में ही लीन रहतीं | 
 
|| शिवपुराण ||
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