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January 28, 2023 15:37
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संध्या का चरित्र

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सूत जी बोले-हें ऋषियों! नारद जी के इस प्रकार प्रश्न करने पर ब्रह्माजी ने कहा-मुने! संध्या का चरित्र सुनकर समस्त कामनिया सती-साध्वी हो सकती हैं | वह संध्या मेरी मानस पुत्री थी, जिसने घोर तपस्या करके अपना शरीर त्याग दिया था | फिर वह मुनिश्रेष्ठ मेधातिथि की पुत्री अरुंधती के रूप में जन्मी | संध्या ने तपस्या करते हुए अपना शरीर इसलिए त्याग दिया था क्योंकि वह स्वयं को पापिनी समझती थी | उसे देखकर स्वयं उसके पिता और भाइयो में काम की इच्छा जाग्रत हुई थी | तब उसने इसका प्रायश्चित करने के बारे में सोचा तथा निश्चय किया कि वह अपना शरीर वैदिक अग्नि में जला देगी, जिससे मर्यादा स्थापित हो | भूतल पर जन्म लेने वाला कोई भी जीव तरूणावस्था से पहले काम के प्रभाव में नहीं आ पाएगा | यह मर्यादा स्थापित कर मैं अपने जीवन का त्याग कर दूँगी |

मन में ऐसा विचार करके संध्या चंद्रभाग नामक पर्वत पर चली गई | यही से चंद्रभागा नदी का आरम्भ हुआ | इस बात का ज्ञान होने पर मैंने वेद-शास्त्रों के पारंगत, विद्वान, सर्वज्ञ और ज्ञानयोगी पुत्र वशिष्ठ को वह जाने की आज्ञा दी | मैंने वशिष्ठ जी को संध्या को विधिपूर्वक दीक्षा देने के लिए वह भेजा था |

नारद! चंद्रभाग पर्वत पर एक देव सरोवर हैं, जो जलाशयोचित गुणों से पूर्ण हैं | इस सरोवर के तट पर बैठी संध्या इस प्रकार सुशोभित हो रही थी, जैसे प्रदोष काल में उदित चंद्रमा और नक्षत्रों से युक्त आकाश शोभा पाता हैं | तभी उन्होंने चंद्रभागा नदी का भी दर्शन किया | तब उस सरोवर के तट पर बैठी संध्या से वशिष्ठ जी ने आदरपूर्वक पूछा, हें देवी! तुम इस निर्जन पर्वत पर क्या कर रही हो ? तुम्हारे माता-पिता कौन हैं ? यदि यह छिपाने योग्य न हो तो कृपया मुझे बताओ | यह वचन सुनकर संध्या ने महर्षि वशिष्ठ की ओर देखा | उनका शरीर दिव्य तेज से प्रकाशित था | मस्तक पर जटा धारण किए वे साक्षात् कोई पुण्यात्मा जान पड़ते थे | संध्या ने आदरपूर्वक प्रणाम करते हुए वशिष्ठ जी को अपना परिचय देते हुए कहा-ब्रह्मन! मैं ब्रह्माजी की पुत्री संध्या हूँ | मैं इस निर्जन पर्वत पर तपस्या करने आई हूँ | यदि आप उचित समझे तो मुझे तपस्या की विधि बताइए | मै तपस्या के नियमों को नहीं जानती हूँ | अतः मुझ पर कृपा करके आप मेरा उचित मार्गदर्शन करे | संध्या की बात सुनकर वशिष्ठ जी ने जान लिया कि देवी संध्या मन में तपस्या का दृढ संकल्प कर चुकी हैं | इसलिए वशिष्ठ जी ने भक्तवत्सल भगवान शिव का स्मरण करते हुए कहा-

हें देवी! जो सबसे महान और उत्कृष्ट हैं, सभी के परम आराध्य हैं, जिन्हें परमात्मा कहा जाता हैं, तुम उन महादेव शिव को अपने ह्रदय में धारण करो | भगवान शिव ही धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के स्त्रोत हैं | तुम उन्ही का भजन करो | ‘ॐ नमः शिवाय’ मंत्र का जप करते हुए मौन तपस्या करो | उसके अनुसार मौन रहकर ही स्नान तथा शिव-पूजन करो | प्रथम दो बार छठे समय में जल को आहार के रूप में लो | तीसरी बार छठा समय आने पर उपवास करो | देवी! इस प्रकार की गई तपस्या ब्रह्मचर्य का फल देने वाली तथा अभीष्ट मनोरथो को पूरा करने वाली होती हैं | अपने मन में शुभ उद्देश्य लेकर शिवजी का मनन व चिंतन करो | वे प्रसन्न होकर तुम्हारी मनोकामना अवश्य पूरी करेंगे | इस प्रकार संध्या को तपस्या की विधि बताकर और उपदेश देकर मुनि वशिष्ठ वह से अंतर्धान हो गए |

 

|| शिवपुराण ||

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