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January 28, 2023 15:52
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सती चरित्र



नारद जी ने पूछा-हें ब्रह्माजी! आपके श्रीमुख से मंगलकारी व अमृतमयी शिव कथा सुनकर मुझमें उनके विषय में और अधिक जानने की और लालसा उत्पन्न हो गई हैं | अतः भगवान शिव के बारे में मुझे बताइए | विश्व की सृष्टि करने वाले हें ब्रह्माजी! मै सती के विषय में भी जानना चाहता हूँ | सदाशिव योगी होते हुए एक स्त्री के साथ विवाह करके गृहस्त कैसे हो गए ? उन्हें विवाह करने का विचार कैसे आया ? जो पहले दक्ष की कन्या थी, फिर हिमालय की कन्या हुई, वे सती (पार्वती) किस प्रकार शंकरजी को प्राप्त हुई ? पार्वती ने किस प्रकार घोर तपस्या की और कैसे उनका विवाह हुआ ? कामदेव को भस्म कर देने वाले भगवान शिव के आधे शरीर में वे किस प्रकार स्थान पा सकी ? उनका अर्धनारीश्वर रूप क्या हैं ? हें प्रभो! आप ही मेरे इन प्रश्नों के उत्तर दे सकते हैं | आप ही मेरे संशयों का निवारण कर सकते हैं |

ब्रह्माजी ने कहा-हें नारद! देवी सती और भगवान शिव का शुभ यश परमपावन दिव्य और गोपनीय हैं | उसके रहस्य को वे ही समझते हैं | सर्वप्रथम तुम्हारी प्रार्थना पर मैं सती के चरित्र को बताता हूँ |

पहले मेरे एक कन्या पैदा हुई | जिसे देखकर मैं काम पीड़ित हो गया | तब रूद्र ने धर्म का स्मरण कराते हुए मुझे बहुत धिक्कारा | फिर वे अपने निवास कैलाश पर्वत को चले गए | उन्हें मैंने समझाने की कोशिश की, परन्तु मेरे सभी प्रयत्न निष्फल हो गए | तब मैंने शिवजी की आराधना की | शिवजी ने मुझे बहुत समझाया परन्तु मैंने हठ नहीं छोड़ा और फिर रुद्रदेव को मोहित करने के लिए शक्ति का उपयोग करने लगा | मेरे पुत्र दक्ष के यहाँ सती का जन्म हुआ | वह दक्ष सुता ‘उमा’ नाम से उत्पन्न होकर कठिन तप करके रूद्र की स्त्री हुई | रूद्र ने गृहस्थाश्रम में सुखपूर्वक समय व्यतीत किया | उधर शिवजी की माया से दक्ष को घमंड हो गया और वह महादेव जी की निंदा करने लगा |

दक्ष ने एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया | उस यज्ञ में दक्ष ने मुझे, विष्णुजी को, सभी देवी-देवताओं को और ऋषि मुनियों को निमंत्रण दिया परन्तु महादेव शिवजी एवं अपनी पुत्री सती को उस विशाल यज्ञ का निमंत्रण नहीं दिया | सती को जब इस बात की जानकारी मिली, तो उन्होंने शिव-चरणों में वंदना कर उनसे दक्ष-यज्ञ में जाने की इच्छा प्रकट की | भगवान शिव ने देवी सती को बहुत समझाया कि बिना बुलाए ऐसे आयोजनों में जाना अपमान और अनिष्टकारक होता हैं | लेकिन सती ने जाने का हठ किया | शिव ने भावी को देखते हुए आज्ञा दे दी | शिव सर्वज्ञ हैं | सती पिता के घर चली गई | वह यज्ञ में महादेव जी के लिए भाग न देख और अपने पिता के मुख से अपने पति की घोर निंदा सुनकर उन्हें बहुत क्रोध आया | वे महादेव की निंदा सहन न कर सकी और उन्होंने उसी यज्ञ कुंद में कुद्कर अपने शारीर का त्याग कर दिया |

जब इसका समाचार शिवजी तक पहुंचा, तो वे बहुत कुपित हुए | उन्होंने अपनी जटा का एक बाल उखाडकर वीरभद्र नामक अपने गण को उत्पन्न किया | भगवान शिव ने वीरभद्र को आज्ञा दी कि वह दक्ष के यज्ञ का विध्वंस कर दे | वीरभद्र ने शिव आज्ञा का पालन करते हुए यज्ञ का विध्वंस कर दिया और दक्ष का सिर काट दिया | इस उपद्रव को देखकर सभी लोग भगवान शिव की प्रार्थना करने लगे | तब भगवान शिव ने दक्ष को पुनः जीवित कर दिया और उनके यज्ञ को पूर्ण कराया | भगवान शिव सती के मृत शारीर को लेकर वहा से चले गए | उस समय सती के शारीर से उत्पन्न ज्वाला पर्वत पर गिरी थी | वही पर्वत आज भी ज्वाला मुखी के नाम से पूजित हैं | आज भी उसके दर्शन से मनोकामनाए पूरी होती हैं |

वही सती दुसरे जन्म में हिमाचल के घर में पुत्री के रूप में प्रकट हुई, जिनका नाम पार्वती था | उन्होंने कठोर तप द्वारा पुनः महादेव शिव को अपने पति के रूप में प्राप्त कर लिया |

 

|| शिवपुराण ||

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