श्री शीतला सप्तमी की हार्दिक शुभकामनाएं


ॐ नमामि शीतला देवी सर्व रोग विनाशिनी। सर्व रोग हरे देवी त्राहिमाम शरणागतम्।।

ॐ शीतले त्वं जगन्माता शीतले त्वं जगदपिता।
शीतले त्वं जगद्धात्री शितलायै नमो नमः।।
भगवती शीतला माताजी नवदुर्गाओं में सातवी दुर्गाजी है।
जो श्री आद्या की सप्तम दुर्गा कालरात्रि की सौम्य मूर्ति है। 9 करोड़ दुर्गाओं में सर्व शक्ति अधिष्ठात्री है। ऐसी सर्वरोग निवारिणी शीतला माता को अनन्त प्रणाम हो। मा जगदम्बा सभी रोग बाधाओं से भक्तो को सुरक्षित रखे। शीतला सप्तमी की बधाई हो।


स्कंद पुराण अनुसार जब जगद में अनेक रोगों के कारण संसार मे लोग असमय ही मृत्यु के मुख में समाने लगे तब संसार मे सभी मनुष्यों ने ऋषयो मुनियों ने अपने अपने इष्टदेव व इष्टदेवी का स्मरण करके इन असाध्य रोगों महामारियों के नाश के लिए प्रार्थना की तब सभी देवता भगवान ब्रह्मा विष्णु महेश के पास गए कार्य की गम्भीरता को विचारकर तीनो ही प्रभुओं ने पूर्णिमा से सप्तमी पर्यंत सपत्नीक माता राज राजेश्वरी आदिशक्ति की तपस्चर्या की तब चैत्र कृष्ण सप्तमी के दिन माताजी ने दर्शन दिये और अपने हाथ से झाड़ा मारकर सभी को रोगमुक्त कर दिया और अम्रृत कलश से अमृत वर्षण करके सभी को स्वस्थ कर दिया जब भगवान शिव ने माता जगदम्बा की स्तुत्ति की तब जगदम्बा ने कहा आप तीनो ही देवताओं ने जिन सात दिनों में मेरी भक्ति पूर्वक आराधना की है। अगर इन दिनों में कोई मेरी आराधना करेगा ब्रह्ममुहूर्त में शीतल जल से मेरा अभिषेक करेगा शीतल भोग लगाकर स्वयं उसे भक्षण करेगा वह महान रोगों बीमारियों से मुक्त हो जाएगा। शिवजी को इतना कह जगदम्बा अंतर्ध्यान होगयी पुनः अपने मणिद्वीप धाम में पधार गयी।


प्रस्तुत कथा का वैज्ञानिक भावार्थ यह है। की अधितकर महामारियां गर्मियों के दिनों में ही फैलती है। जो गर्मियों में प्रातः काल उठकर जगदम्बा का भजन करे निम की झाड़ू अर्थात निम के पत्तो का सेवन करे शीतल जल से स्नान करें तो उसकी देह भगवती की कृपा पात्र हो जाती है। और वह शरीर महामारी आदि से बच सकता है। निरोग हो जाता है।








इस अवतार में जगदम्बा के वाहन सिंहराज को थोड़ा मान हो गया था। कि जहां भी जाना होता है। जगदम्बा मेरे बिना कही नही जाती मेरे बिना काम नही चलता माताजी का तो उनका भृम भी जगदम्बा ने उतार दिया एक गधे को अपना वाहन बनाकर जगद में सम्मानित किया, इस गधे की स्तुत्ति स्वयं भगवान शिव ने की
अर्थात कृपा जब जगदम्बा की हो तो एक गधा भी पूज्य होकर महादेव के लिये भी सम्मानित हो जाता है। और जगदम्ब कृपा न हो तो एक सिंह भी केवल एक पशु ही रह जाता है।



आज शीतला सप्तमी है। आइए श्री आद्या का भजन करे

प्रस्तुत है। भगवान महादेव रचित श्री शीतलाष्टकम जिसका पाठ करने से सप्तम दुर्गा माता कालरात्रि श्री शीतला माताजी प्रसन्न होकर निरोग होने का शुभाशीष देती है।
जय जगदम्ब


श्रीगणेशाय नमः ॥
विनियोग:
ऊँ अस्य श्रीशीतला स्तोत्रस्य महादेव ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, राज राजेश्वरी कालरात्रि शीतला देवता, देवीलक्ष्मी बीजम्, देवी पार्वती शक्तिः, सर्वविस्फोटक निवृत्तये जपे विनियोगः ॥

ऋष्यादि-न्यासः
श्रीमहादेव ऋषये नमः शिरसि, अनुष्टुप् छन्दसे नमः मुखे, श्रीशीतला देवतायै नमः हृदि, लक्ष्मी (श्री) बीजाय नमः गुह्ये, भवानी शक्तये नमः पादयो, सर्व-विस्फोटक-निवृत्यर्थे जपे विनियोगाय नमः सर्वांगे ॥

ध्यानः
ध्यायामि शीतलां देवीं, रासभस्थां दिगम्बराम् ।
मार्जनी-कलशोपेतां शूर्पालङ्कृत-मस्तकाम् ॥

मानस-पूजनः
ॐ लं पृथ्वी-तत्त्वात्मकं गन्धं श्री शीतला-देवी-प्रीतये समर्पयामि नमः। ॐ हं आकाश-तत्त्वात्मकं पुष्पं श्री शीतला-देवी-प्रीतये समर्पयामि नमः। ॐ यं वायु-तत्त्वात्मकं धूपं श्री शीतला-देवी-प्रीतये समर्पयामि नमः। ॐ रं अग्नि-तत्त्वात्मकं दीपं श्री शीतला-देवी-प्रीतये समर्पयामि नमः। ॐ वं जल-तत्त्वात्मकं नैवेद्यं श्री शीतला-देवी-प्रीतये समर्पयामि नमः। ॐ सं सर्व-तत्त्वात्मकं ताम्बूलं श्री शीतला-देवी-प्रीतये समर्पयामि नमः।

मन्त्रः
ॐ ह्रीं श्रीं शीतलायै नमः ॥ [११ बार]

॥ ईश्वर उवाच॥
वन्दे अहं शीतलां देवीं रासभस्थां दिगम्बराम् ।
मार्जनी कलशोपेतां शूर्पालं कृत मस्तकाम् ॥1॥

वन्देअहं शीतलां देवीं सर्व रोग भयापहाम् ।
यामासाद्य निवर्तेत विस्फोटक भयं महत् ॥2॥

शीतले शीतले चेति यो ब्रूयाद्दारपीड़ितः ।
विस्फोटकभयं घोरं क्षिप्रं तस्य प्रणश्यति ॥3॥

यस्त्वामुदक मध्ये तु धृत्वा पूजयते नरः ।
विस्फोटकभयं घोरं गृहे तस्य न जायते ॥4॥

शीतले ज्वर दग्धस्य पूतिगन्धयुतस्य च ।
प्रनष्टचक्षुषः पुसस्त्वामाहुर्जीवनौषधम् ॥5॥

शीतले तनुजां रोगानृणां हरसि दुस्त्यजान् ।
विस्फोटक विदीर्णानां त्वमेका अमृत वर्षिणी ॥6॥

गलगंडग्रहा रोगा ये चान्ये दारुणा नृणाम् ।
त्वदनु ध्यान मात्रेण शीतले यान्ति संक्षयम् ॥7॥

न मन्त्रा नौषधं तस्य पापरोगस्य विद्यते ।
त्वामेकां शीतले धात्रीं नान्यां पश्यामि देवताम् ॥8॥

॥ फल-श्रुति ॥
मृणालतन्तु सद्दशीं नाभिहृन्मध्य संस्थिताम् ।
यस्त्वां संचिन्तये द्देवि तस्य मृत्युर्न जायते ॥9॥

अष्टकं शीतला देव्या यो नरः प्रपठेत्सदा ।
विस्फोटकभयं घोरं गृहे तस्य न जायते ॥10॥

श्रोतव्यं पठितव्यं च श्रद्धा भक्ति समन्वितैः ।
उपसर्ग विनाशाय परं स्वस्त्ययनं महत् ॥11॥

शीतले त्वं जगन्माता शीतले त्वं जगत्पिता।
शीतले त्वं जगद्धात्री शीतलायै नमो नमः ॥12॥

रासभो गर्दभश्चैव खरो वैशाख नन्दनः ।
शीतला वाहनश्चैव दूर्वाकन्दनिकृन्तनः ॥13॥

एतानि खर नामानि शीतलाग्रे तु यः पठेत् ।
तस्य गेहे शिशूनां च शीतला रूङ् न जायते ॥14॥

शीतला अष्टकमेवेदं न देयं यस्य कस्यचित् ।
दातव्यं च सदा तस्मै श्रद्धा भक्ति युताय वै ॥15॥
॥ श्रीस्कन्दपुराणे शीतलाअष्टक स्तोत्रं ॥

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