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January 28, 2023 14:59
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वैश्रवण कुबेर की कथा

     अल्पकाल में ही पुलत्स्य-पुत्र मुनिश्रेष्ठ विश्रवा अप्ब्ने पिता के ही समान तप करने लगे | वे सत्यवादी, शीलवान, जितेन्द्रिय, स्वाध्याय निरत, पवित्र, भोगो में अनासक्त और सर्वदा धर्म तत्पर रहा करते थे | जब विश्रवा के आचरण को देखकर महामुनि भरद्वाज ने अपनी देवाङ्गना तुल्य सुंदरी कन्या का उनसे विवाह कर दिया | 
 
     फिर संतानेच्छुक उस कन्या से धर्मात्मामुनी विश्रवा ने एक ऐसा पुत्र उत्पन्न किया जो ब्राह्मणोचित समस्त गुणों से युक्त परम अद्भुत बलवान था | उसके जन्म से पितामह पुलस्त्यजी को बड़ी प्रसन्नता हुई | उन्होंने अपने पौत्र के कल्याणकारिणी बुद्धि देखकर कहा कि यह तो धनाध्यक्ष होगा | फिर तो उन्होंने ही देवर्षियो सहित उसका नामकरण किया और कहा कि ‘यह बालक विश्रवा से उत्पन्न हुआ हैं और वैसा ही हैं भी | 
 
     अत: इसका नाम वैश्रवण होगा | फिर तो उस महातपोवन में रहते हुए वह वैश्रवण भी बड़े तेजस्वी हुए | उन्होंने सोचा कि, धर्म की ही परम गति हैं | अत: मैं भी धर्माचरण करूँगा | उन्होंने कठिन व्रत के साथ हजारों वर्ष के घोर तप किए, जिसमे वे कभी जल पीकर, कभी वायु पान कर और कभी निराहार भी रह जाते थे | 
 
     इस प्रकार उन्होंने एक हजार वर्ष, एक वर्ष की भांति व्यतीत कर दिये | तब तो ब्रह्माजी उनके इस तप को देखकर प्रसन्न हो गए और इन्द्रादिक देवताओ के साथ ले उन्हें वर देने के लिए उनके आश्रम पर पधारे और बोले-हें सुव्रत! हें वत्स! मैं तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न हूँ, वर मांगो | 
 
     तब अपने समक्ष ब्रह्माजी को उपस्थित देख वैश्रवण ने कहा-भगवन! मेरी इच्छा हैं के मै लोकपाल बनूँ और समस्त धन मेरे पास रहे | वैश्रवण की यह बात सुनकर ब्रह्माजी को और भी प्रसन्नता हुयी और उन्होंने ‘तथास्तु’ कहकर उसकी प्रार्थना स्वीकार की तथा वैश्रवण से फिर बोले-हें वत्स! मैं चौथा लोकपाल रचने ही वाला था, अब तुम्ही उस पड़ को स्वीकार करो | जाओ अपार धन के स्वामी बनो | इन्द्र, वरुण और यम के साथ तुम्हारा, चौथा स्थान होगा | 
 
     यह सूर्य के समान तेजस्वी पुष्पक विमान हैं, इसे तुम अपनी सवारी के लिए लो और आज ही से देवताओं की समानता प्राप्त करो | अब मैं अपने लोक को जाता हूँ, तुम्हारा कल्याण हो | 
 
     ऐसा कहकर ब्रह्माजी अपने लोक को चले गए | ब्रह्मादि देवताओं के चले जाने पर वैश्रवणजी ने हाथ जोड़कर अपने पिता से कहा-‘भगवन! मैंने पितामह ब्रह्माजी से अभीष्ट वरदान को प्राप्त किया हैं, किन्तु उन्होंने मेरे रहने का कोई स्थान नहीं बताया | अत: अब आप ही मेरे लिए किसी ऐसे निवास स्थान का विचार कीजिये, जहाँ रहने से किसी भी प्राणी को कष्ट न हो ? ‘पुत्र के इस प्रकार कहने पर मुनि श्रेष्ठ विश्रवा बोले-धर्मज्ञ! सुनो! दक्षिण समुद्र के तट पर एक त्रिकुट नामक पर्वत हैं, जिसके शिखर पर एक विशाल पूरी हैं, जिसका नाम लंका हैं | 
 
     विश्वकर्मा ने उसे राक्षसों के लिये बनाया था | वह अमरावती के ही समान रमणीक हैं | अत: तुम लंका में ही निवास करो | उसके चतुर्दिक चौड़ी खाई खुदी हैं और वह यंत्रों तथा शस्त्रों से परिपूर्ण हैं | वह लंकापुरी रमणीय हैं | सुवर्ण और वैदूर्य मणि के उसके द्वार हैं | पहले  उसमे राक्षस रहा करते थे | किन्तु अब विष्णु के भय से वे वहाँ से भागकर पृथ्वी के नीचे रसातल में जा बसे | तुम वहाँ जामकर सुख से रहो | 
 
     वहाँ तुम्हे या और किसी को भी कोई कष्ट न होगा | अब अपने पिता विश्रवा मुनि के ऐसा कहने पर धर्मात्मा पुत्र वैश्रवण अब राक्षस की चारो ओर समुद्र से घिरी हुई लंका में प्रसन्नतापूर्वक निवास करने लगे | देवता और गन्धर्व उनका यशोगान करने लगे | उनका ह्रदय बड़ा विनीत था | धर्मात्मा धनेश्वर वैश्रवण पुष्पक द्वारा समय-समय पर अपने माता-पिता के समीप प्राय: आते-जाते रहते थे |
 
 
 
 
 
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