न केवल प्राचीन समय में अपितु वर्तमान समय में लोग आचार्य चाणक्य की हस्ती से लोग रूबरू हो चुके हैं। इसका कारण है इनके द्वारा रचा गया नीतिग्रंथ। जिसका नाम है चाणक्य नीति सूत्र। बताया जाता है कि इस नीति सूत्र में आचार्य ने मानव जीवन को लेकर ऐसी-ऐसी बातें बताई व जीवन से जुड़े किस्से, तथ्य आदि बताए हैं, जो व्यक्ति के लिए अपने जीवन में बहुत उपयोगी व कारागर साबित होता है। आए दिन हम अपनी वेबसाइट के माध्यम से आपको आचार्य चाणक्य के नीति सूत्र में उल्लेखित श्लोक आदि से अवगत करवाते रहते हैं। अपने इसी कड़ो को बरकरार रखते हुए एक बार फिर से हम आपको बताने जा रहे हैं आचार्य चाणक्य द्वारा बताया गया ऐसा श्लोक जिसमें उन्होंने बताया है कि किस तरह के लोग हमेशा अपने जीवन में केवल दुख और कष्ट के भागीदार बनते हैं। तो आइए बिल्कुल भी देर न करते हुए जानते हैं चाणक्य नीति का वो श्लोक साथ ही साथ जानेंगे इसका भावार्थ व अर्थ।

चाणक्य नीति श्लोक-
कष्टं च खलु मूर्खत्वं कष्टं च खलु यौवनम्।
कष्टात्कष्टतरं चैव परगृहेनिवासनम् ॥

भावार्थ उपरोक्त दिए श्लोक में चाण्क्य के अनुसार किसी भी इंसान के लिए मूर्खता कष्ट है, यौवन भी एक प्रकार का कष्ट है, परंतु किंतु किसी दूसरे के घर में किसी के सहारे या टुकड़ों पर रहना दुनिया का सबसे बड़ा कष्ट, बल्कि कष्टों का भी कष्ट माना जाता है।

यहां जाने इस श्लोक का संपूर्ण अर्थ-
बता दें उपरोक्त श्लोक चाणक्य नीति सूत्र के दूसरे अध्याय के आठवां श्लोक है। जिसमें उन तीन चीजों के बारे में विस्तार से बताया है जो व्यक्ति को सबसे ज्यादा कष्ट प्रदान करते हैं।

आचार्य कहते हैं प्रत्येक व्यक्ति चाहे तो अपनी प्रसन्नता को स्वयं प्राप्त कर सकता है, परंतु मूर्ख लोग इस सूची में शामिल नहीं हो सकते क्योंकि मूर्ख व्यक्ति को सही गलत की पहचान नहीं होती। जिसका परिणाम ये होता है कि वह अपने जीवन में ज्यादातर समस्याओं व कष्टों से घिरे रहते हैं तथा उनका जीवन दुखों भरा व्यतीत होता है। कुल मिलाकर चाणक्य के अनुसार मूर्ख लोग अपने जीवन में अधिकतर रूप से केवल कष्ट प्राप्त करते हैं।

इसके बाद आचार्य चाणक्य कहते हैं मूर्ख व्यक्तियों के अलावा प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में अपने यौवन अर्थात जवानी में सबसे अधिक दुख या कष्ट पाता है। चाणक्य के अनुसार ये एक ऐसी अवस्था मानी जाती हैं, जब व्यक्ति सैकड़ों प्रकार की इच्छाएं रखता हैं, फिर बात केवल इच्छाएं करने तक सीमित नहीं होती। बल्कि उम्र के इस मोड़ पर व्यक्ति अपनी हर इच्छा के पूरे होने की उम्मीद करता है और यही उम्मीद उसे सबसे ज्यादा दुख देती है। क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति की हर इच्छा पूरी हो ऐसा हो पाना संभव नहीं है।

तो इसके विपरीत जब इस उम्र में व्यक्ति की कुछ इच्छाएं पूरी हो जाती हैं, तो कभी कभी उसमें अधिक रूप में अहम भर जाता है। जो उसके अच्छे भले जीवन को तहस-नहस करने की क्षमता रखता है। तो चाणक्य के अनुसार युवास्था में व्यक्ति अत्यंत दुख भोगता है।

आखिर में आचार्य चाणक्य कहते हैं यौवन और मूर्खता से भी अधिक कष्टकारी होता है किसी के टुकड़ों पर या किसी के घर में रहना। चाणक्य के अनुसार जब आप किसी के घर में रहते हैं, तो आप संपूर्ण रूप से उस पर निर्भर हो जाते हैं। आप अपने जीवन से जुड़ा कोई छोटा-बड़ा फैसला नहीं ले पाते, आपकी स्वंतत्रता धीरे धीरे खोने लगती हैं। जिस वजह से आपके जीवन मे आपकी कम, दूसरे की दख्लअंदाज़ी हो जाती है। इतना ही नहीं इसकी वजह से आप अंदर ही अंदर घुटने लगते हैं और अपने जीवन का आंनद लेना भूल जाते हैं, और केवल कष्ट के हकदार बन जाते हैं।

इसलिए चाणक्य ने बताया है कि किसी के सहारे पर या किसी पर निर्भर होकर इंसान अपनी स्वंतत्रता तो खोता ही है, साथ ही साथ खुद को एहसानमंद महसूस करता है और धीरे धीरे अपनी अहमियत को खो बैठता है।

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