By – Barkha Pandey

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स्वाधिष्ठान चक्र नाभि से लगभग 1 से 3 अंगूली नीचे जो पेट है उसकी सीध में रीढ़ की हड्डी का जो मनका है उसके अंदर विराजमान है। स्वाधिष्ठान चक्र जल तत्व से जुड़ा है। इसमें भी जानवर की प्रवृत्ति होती है। इसके घूमने की आवृत्ति काम होती है। इसमें प्रजानन या प्रसव और रचनात्मक कार्यो की चेतना आती है। यह ओवेरीज (अंडकोष) ग्लैंड से जुड़ा होता है। यह प्रजानन अंगों, ब्लैडर नीचे की हिस्से इत्यादि को नियंत्रित करता है। स्वाधिष्ठान चक्र के संतुलित होने की अवस्था मे व्यक्ति की सेक्सुअल खुशियाँ मिलती है। इस चक्र के ज्यादा सक्रिय होने से सॉर्ट सर्किट होता है। ऐसे लोग समाज में नकासूर और सूपनखा जैसे बन जाते है। यह चक्र जब कम सक्रिय होता है, जब कोई सेक्सुअल या भावनात्मक तकलीफो से गुज़रा होता है लिंग की असामानयाता से गुज़र रहा होता है।
इन चक्र में छै पंखुरिया होती है। यह नारंगी रंग से प्रदर्शित होता है। यह तमसगुण से जुड़ा हुआ है। इसका बीज मंत्र है वं_

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