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January 28, 2023 14:54
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रावण, कुम्भकर्ण और विभीषण का तप तथा वरदान

 

 
 
     इतना सुनकर श्रीरामचंद्रजी ने अगस्त्य मुनि से पूछा-हें ब्रह्मन! उन महाबली भाइयों ने कैसे तपस्या की ? यह सुनकर अगस्त्यजी प्रसन्न होकर बोले-हें रामजी! कुम्भकर्ण अपनी इन्द्रियों को संयमित कर धर्म-मार्ग में स्थित हुआ और ग्रीष्मकाल में चारो ओर अग्नि जलाकर पञ्चाग्नि तापने लगा | फिर वर्षा ऋतु में वीरासन से बैठकर जल की वृष्टि को सहता तथा शीतकाल में जल में बैठा रहता | इस प्रकार तप करते हुए उसने दस हजार वर्ष व्यतीत कर दिए | विभीषण तो सदा से ही धर्मात्मा थे | वे नित्य धर्म-परायण हो पाँच हजार वर्षों तक एक पैर से खड़े रहे |
 
     उनका नियम समाप्त होने पर आकाश से पुष्प वृष्टि हुई तथा देवताओं ने स्तुति की | तदनन्तर विभीषण ने स्तुति की | तदनन्तर विभीषण ने अपनी दोनों भुजाएं मस्तक के ऊपर उठाकर स्वाध्याय-परायण हो पाँच हजार वर्षों तक सूर्य की आराधना की | इस प्रकार मन को वश किये विभीषण ने भी दश हजार वर्ष व्यतीत कये | दशग्रीव ने तो दश हजार वर्ष तक निरंतर उपवास किया और प्रत्येक हजार वर्ष के पूर्ण होने पर वह अपना एक मस्तक काटकर अग्नि में होम कर देता था | इस प्रकार नौ हजार वर्ष व्यतीत होने तक उसके नौ मस्तक अग्निदेव को अर्पित हो गये और जब दस हजार वर्ष पूर्ण होने लगा तब उसने अपना दशवाँ मस्तक काटना चाहा, फिर तो उसी क्षण उसके समक्ष ब्रह्माजी आ उपस्थित हुए |
 
     उनके साथ देवता भी थे | तब ब्रह्माजी ने संतुष्ट होकर कहा-दशग्रीव! मैं तेरे ऊपर प्रसन्न हूँ, वर माँग | पितामह की यह वाणी सुनकर दशग्रीव का चित्त प्रसन्न हो गया | उसने नत-मस्तक हो ब्रह्माजी को प्रणाम किया और हर्ष गदगद वाणी में कहा-‘भगवन! प्राणियों को मृत्यु का भय सर्वदा लगा रहता हैं, अतएव मैं अमर होना चाहता हूँ |’ ब्रह्माजी ने कहा-ऐसा नहीं हो सकता | तू और कोई वर माँग | हें राम! जब लोककर्ता ब्रह्माजी ने ऐसा कहा, तब दशग्रीव ने हाथ जोड़कर यह प्रार्थना की-प्रजानाथ! मैं गुरुड, नाग, यक्ष, दैत्य, दानव, राक्षस तथा देवताओं के लिये अवध्य होऊं | अन्य प्राणियों की मुझे चिंता नहीं हैं |
 
     मनुष्य आदि को तो मैं तृणावत समझता हूँ | दशग्रीव के ऐसा कहने पर देवताओं सहित खड़े ब्रह्माजी ने कहा-अच्छा, ऐसा ही होगा | हें राम! दशग्रीव से ऐसा कहकर ब्रह्माजी उससे फिर बोले-हें अनाथ! मैं तेरे ऊपर अति प्रसन्न हूँ | अत: मैं अपनी ओर से भी तुझे वर देता हूँ | तूने अपने जिन सिरों को काटकर अग्नि में होम किया हैं, वे सिर तेरे पूर्ववत हो जायेंगें तथा एक और भी तुझे दुर्लभ वर देता हूँ कि जिस समय तू जैसा रूप धारण करना चाहेगा, वैसा रूप तेरा हो जायेगा |
 
     ब्रह्माजी के यह कहते ही राक्षस दशग्रीव के होम किए सब सिर पूर्ववत निकल आये | हें राम! दशग्रीव को ऐसा वर दे, ब्रह्माजी विभीषण से बोले-हें वत्स विभीषण! मैं तेरी धर्म बुद्धि देखकर प्रसन्न हूँ, अत: हें सुव्रत! तू वर माँग | धर्मात्मा विभीषण ने हाथ जोड़कर कहा-हें भगवन! जब आप लोक गुरु ब्रह्माजी स्वयं ही मुझ पर प्रसन्न हैं, तब मुझे और चाहिए ही क्या ? मैं तो ऐसे ही कृतार्थ हो गया | परन्तु आप मुझे वर देना ही चाहते हैं तो हें सुव्रत! आप मुझे यह वर दे कि, परम आपदा पड़ने पर भी मेरी बुद्धि धर्म पर ही तत्पर रहे और हें भगवान! बिना किसी के शिक्षित किये ही मुझे ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करना आ जाय और जिस आश्रम में मैं रहूँ उसके प्रति मेरी सदैव निष्ठा वृद्धि होती रहे |
 
     हें परमोदर! मेरा यही सर्वोत्कृष्ट अभीष्ट हैं | ब्रह्माजी ने कहा-एवमस्तु! तुम जैसा चाहते हो सब कुछ वैसा ही होगा | राक्षस-योनियों में उत्पन्न होकर भी तुम्हारी बुद्धि अधर्म में प्रवृत नहीं होती, इसलिए मैं तुम्हे अमरत्व प्रदान करता हूँ | विभीषण से ऐसा कहकर जब ब्रह्माजी कुम्भकर्ण को वर देने के लिए उद्यत हुए, तब सम्पूर्ण देवताओं ने हाथ जोड़कर यह प्रार्थना की-‘भगवान! आप कुम्भकर्ण को वरदान न दीजिए |’ क्योंकि आपको स्वयं ज्ञात ही हैं कि बिना वर पाये ही वह दुष्ट तीनों लोको को सताया करता हैं | नन्दनवन में सभी अप्सराओं और इन्द्र के दश सेवकों को इसने भक्षण कर डाला हैं | इसके भक्षण किये ऋषियों और मनुष्यों की तो गणना ही नहीं हैं |
 
     जब बिना वर पाये ही इसकी यह करनी हैं, तब वर पाने पर तो यह समस्त त्रिभुवन को ही चर्वण कर जायेगा | अत: हें अमितप्रभ! वर के द्वारा इसे अज्ञान प्रदान कीजिए | इससे लोक कल्याण भी होगा और इसका भी मान बना रहेगा | तब देवताओं के ऐसा कहने पर पद्म संभव ब्रह्माजी ने सरस्वती देवी को स्मरण किया | उनके स्मरण करते ही सरस्वती आ पहुंची और हाथ जोड़ कर बोली-‘हें देव! मैं आ गयी हूँ, कहिए क्या आज्ञा हैं ? ब्रह्माजी ने कहा-‘वाणी! तुम राक्षसराज कुम्भकर्ण की जिव्हा पर बैठकर उसके मुँह से देवताओं के अनुकूल बात निकालो |’ सरस्वती ने कहा-‘बहुत अच्छा’|
 
     यह कह सरस्वती कुम्भकर्ण के मुँह में प्रवेश कर गयी | तब ब्रह्माजी ने कहा-महाबाहु कुम्भकर्ण! तुम भी जो चाहो वर माँगो | यह सुनकर कुम्भकर्ण ने कहा-‘देवदेव! मैं यह चाहता हूँ कि, मैं अनेक वर्षों तक सोता रहूँ | ब्रह्माजी ने कहा-तथास्तु! ऐसा कहकर देवताओं सहित ब्रह्माजी चले गए | पश्चात सरस्वती देवी भी उसके मुख से निकल आई और आकाश-मण्डल में चली गयी | अब कुम्भकर्ण को चेत हुआ | 
 
     वह दुरात्मा दु:खी हो चिंता करने लगा कि, हाय! मेरे मुख से ऐसा वचन क्यों निकल गया | मुझे ज्ञात होता हैं कि देवताओं ने आकर मुझे ठग लिया, इस प्रकार वे सब भाई तप द्वारा ब्रह्माजी से वरदान पाकर उस श्लेष्यान्तक वन में अपने पिता के पास फिर आ गये और सुख से रहने लगे |
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