पुरुष का उग्र होना उसके शक्ति तत्व को नष्ट करता हैं ।इश्लिये यही कठोरता के कारण ऐसे पुरुष अपने को एक ऐसे अंधेरे दायरे में कैद कर लेते हैं जहाँ से वो अथहा सिद्धिया शक्तियां भी हासिल कर ले फिर भी नीरस ही रहते है और सौम्यता का भाव लुप्त हो जाता हैं ऐसे पुरुष सामने वालो से संतुष्ट नही रहते सबको अपने हिसाब से बदलने का प्रयत्न करते हैं।

कठोर हो जाते है ।बेचैन रहते हैं, उच्चाट रहते हैं।सदैव दिमाग के घोड़े दौड़ाते रहते हैं क्या सोचते हैं इनको स्वयम को नही पता होता ।स्त्री का उग्र होना भी स्त्री के स्त्री तत्व को नष्ट करता हैं और उसमे पुरुष के गुण,पुरुष के भाव,पुरुष के जैसे दाढ़ी मुछे और कठोरता आ जाती हैं।

इन दोनों के इसी स्वभाव के कारण आजकल के यूवाओ और यूवतियो का विवाह नही हो पाता या लेट होता हैं। इन्ही कारणों से संतान को जन्म नही दे पाते।जब स्त्री में समर्पण भाव नही आएगा जोड़ने का भाव जोकि उसका सबसे बड़ा गुण हैं।नही होगा तो विवाह की ऊर्जा उसमे कहा से जन्म लेगी।ठीक पुरुष में भी जब तक स्वीकार का प्रेम का समर्पण का भाव स्थिरता का भाव नही आएगा तो विवाह की ऊर्जा कहा से जन्म लेगी।


वैवाहिक बन्धन के लिए समर्पण भाव प्रेम भाव स्वीकार्य भाव होना अति आवश्यक है।संतान प्राप्ति में छमाशील, अभेद भाव,प्रेम भाव,प्रकृति प्रेमी भाव,ह्रदय से भरपूर प्रेम का समभाव होना अति आवश्यक हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published.

error: Content is protected !!
%d bloggers like this: