ब्रह्मा जी का अभिमान भंग

नंदीकेश्वर बोले – महादेव जी ब्रह्मा जी के छल पर अत्यंत क्रोधित हुए । उन्होंने अपने त्रिनेत्र ( तीसरी आंख ) से भैरव को प्रकट किया और उन्हें आज्ञा दी कि वह तलवार से ब्रह्मा जी को दंड दे । आज्ञा पाते ही भैरव ने ब्रह्माजी के बाल पकड़ लिए और उनका पांचवा सिर काट दिया । ब्रह्मा जी डर के मारे कांपने लगे । उन्होंने भैरव के चरण पकड़ लिए तथा क्षमा मांगने लगे । इसे देखकर श्री विष्णु ने भगवान शिव से प्रार्थना की कि आपकी कृपा से ही ब्रह्मा जी को पांचवा सर मिला था । अतः आप इन्हें क्षमा कर दें । तब शिव जी की आज्ञा पाकर ब्रह्मा को भैरव ने छोड़ दिया । शिव जी ने कहा तूमने प्रतिष्ठा और ईश्वरत्व को दिखाने के लिए छल किया है । इसलिए मैं तुम्हें श्राप देता हूं कि तुम सत्कार , स्थान व उत्सव से विहीन रहोगे । ब्रह्मा जी को अपनी गलती का पछतावा हो चुका था । उन्होंने भगवान शिव के चरण पकड़कर क्षमा मांगी और निवेदन किया कि वह उनका पांचवां सिर पुनः प्रदान करें ।

महादेव जी ने कहा – जगत की स्थिति को बिगड़ने से बचाने के लिए पापी को दंड अवश्य देना चाहिए , ताकि लोक मर्यादा बनी रहे । मैं तुम्हें वरदान देता हूं कि तुम गणों के आचार्य कहलाओगे और तुम्हारे बिना यज्ञ पूर्ण ना होंगे ।

फिर उन्होंने केतकी के पुष्प से कहा – अरे दुष्ट केतकी पुष्प ! अब तुम मेरी पूजा के अयोग्य रहोगे । तब केतकी पुष्प बहुत दुखी हुआ और उनके चरणों में गिर कर माफी मांगने लगा । तब महादेव जी ने कहा – मेरा वचन तो झूठा नहीं हो सकता । इसलिए तू मेरे भक्तों के योग्य होगा । इस प्रकार तेरा जन्म सफल हो जाएगा।

 

 

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जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी। 
दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते।।
 
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