शिवलिंग का रहस्य एवं महत्त्व 

सूत जी कहते है – हें शोनक जी ! श्रवण , कीर्तन और मनन जैसे साधनों को करना प्रत्येक के लिए सुगम नही है | इसके लिए योग्य गुरु और आचार्य चाहिए | गुरुमुख से सुनी हुई वाणी मन की शंकाओं को दग्ध करती है | गुरुमुख से सुने शिव तत्व द्वारा शिव के रूप – स्वरूप के दर्शन और गुणानुवाद से रसानुभूति होती है | तभी भक्त कीर्तन कर पाता है | यदि ऐसा कर पाना संभव न हो , तो मोक्षार्थी को चाहिए कि वह भगवान शंकर के लिंग एवं मूर्ति कि स्थापना करके रोज उनकी पूजा करे | इसे अपनाकर वह इस संसार सागर से पार हो सकता है | संसार सागर से पार होने के लिए इस तरह पुजा आसानी से भक्तिपूर्वक कि जा सकती है | अपनी शक्ति एवं सामर्थ्य के अनुसार धनराशि से शिवलिंग या शिवमूर्ति कि स्थापना कर भक्तिभाव से उसकी पूजा करनी चाहिए | मंडप , गोपुर , तीर्थ , मठ एवं क्षेत्र कि स्थापना कर उत्सव का आयोजन करना चाहिए तथा पुष्प , धुप , वस्त्र , गंध , दीप तथा पुआ और तरह – तरह के भोजन नैवेद्य के रूप में अर्पित करना चाहिए | श्री शिव जी ब्रह्मस्वरूप और निष्कल अर्थात कला रहित भी हें और कला सहित भी | मनुष्य इस दोनों स्वरुपो कि पूजा करते है | शंकर जी को ही ब्रह्म पदवी भी प्राप्त है | कला पूर्ण भगवान शिव कि मूर्ति पूजा भी मनुष्यों द्वारा कि जाती है और वेदों ने भी इस तरह कि पूजा कि आज्ञा प्रदान की है |

 

सनत्कुमार जी ने पूछा – हें नंदिकेश्वर ! पूर्वकाल में उत्पन्न हुए लिंग बैर अर्थात मूर्ति कि उत्पत्ति के सम्बन्ध में आप हमे विस्तार से बताइए |

 

नंदिकेश्वर ने बताया –  मुनिश्वर ! प्राचीन काल में एक बार ब्रह्मा और विष्णु के मध्य युद्ध हुआ तो उनके बीच स्तम्भ रूप में शिव जी प्रकट हो गए | इस प्रकार उन्होंने पृथ्वी लोक का संरक्षण किया | उसी दिन से महादेव जी का लिंग के साथ साथ मूर्ति पूजन भी जगत में प्रचलित हो गया | अंत देवताओं की साकार अर्थात मूर्ति पूजा होने लगी , जो कि अभीष्ट फल प्रदान करने वाली थी | परन्तु शिव के लिंग और मूर्ति , दोनों रूप ही पूजनीय है |

 

|| शिव पुराण || 

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